आजमगढ़ में अखिलेश की रैली, बसपा कार्यकर्ताओं की कमी ने बढ़ाई सपा की बेचैनी

आजमगढ़ में अखिलेश की रैली, बसपा कार्यकर्ताओं की कमी ने बढ़ाई सपा की बेचैनी

Sarweshwari Mishra | Publish: Apr, 19 2019 03:41:41 PM (IST) Azamgarh, Azamgarh, Uttar Pradesh, India

सतीश मिश्र अखिलेश के साथ तो दिखे लेकिन अपनी पार्टी के प्रत्याशी के नामाकंन में नहीं हुए शामिल

आजमगढ़. गेस्ट हाउस कांड के 25 साल बाद सपा और बसपा सत्ता के लिए साथ जरूर आ गए हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के दिल अभी मिले नहीं हैं। इसकी बानगी अखिलेश यादव और संगीता आजाद के नामाकंन में साफ देखने को मिली। अखिलेश के साथ सतीश मिश्र जरूर थे लेकिन बसपा कार्यकर्ताओं की संख्या ना के बराबर थी। जबकि संगीता के नामाकंन में तो एक भी लाल टोपी नहीं दिखी। इससे दोनों दलों में बेचैनी साफ दिख रही है। वहीं विपक्ष खासतौर पर भाजपा इसे अपने पक्ष में मान रही है।

 


बता दें कि गुरूवार को अखिलेश यादव नामाकंन के लिए आजमगढ़ पहुंचे थे। उनके साथ बसपा के सतीश मिश्र भी थे। अखिलेश के नामाकंन और सभा में हजारों की संख्या में सपाई शामिल हुए। अखिलेश के प्रस्ताव में सपा सरकार के पूर्व मंत्री दुर्गा प्रसाद यादव व बसपा विधायक शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली थे। कलेक्ट्रेट से लेकर बैठौली सभा स्थल तक गिने चुने बसपाई ही नजर आए। अखिलेश के पर्चा दाखिला के कुछ मिनट बाद ही लालगंज सुरक्षित सीट से बसपा प्रत्याशी संगीता आजाद ने भी नामाकंन किया। उनके साथ एक भी सपाई नजर नहीं आए। यहां तक कि सपा का कोई विधायक अथवा पूर्व मंत्री उनका प्रस्तावक भी नहीं बना। उनके प्रस्तावक जितेन्द्र तथा निसार अहमद रहे।
यहीं नहीं अखिलेश की सभा में एक से डेढ़ प्रतिशत ही बसपाई भीड़ का हिस्सा दिखे जबकि सतीश मिश्र से लेकर लालगंज प्रत्याशी तक वहां मौजूद थी। मंच पर मौजूद नेता असहज तक हो गये जब अखिलेश यादव ने पूर्वांचल के तमाम प्रत्याशियों का नाम लिया लेकिन संगीता का नाम लेना भूल गए। जब पीछे से एक नेता ने याद दिलाया तो अखिलेश ने संगीता का नाम लिया। एक दूसरे के कार्यक्रम में कार्यकर्ताओं के जाने से परहेज से दूरियां साफ दिख रही है। इस पूरे प्रकरण की जोरदार चर्चा भी है। राजनीति के जानकारों का कहना है कि सच तो यह है कि शीर्ष नेतृत्व ने गठबंधन भले ही कर लिया हो लेकिन कार्यकर्ता खुद को असहज महसूस कर रहा हैं। कारण यह है कि पिछले 25 वर्षों से ये एक दूसरे का विरोध ही करते रहे हैं। खासतौर पर गेस्ट हाउस कांड के बाद से बसपा कार्यकर्ताओं के मन में सपा के प्रति जो भाव उपजा था वह आज भी कायम है। कारण है कि इस कांड को हर दलित मायावती के नहीं बल्कि अपने अपमान से जोड़कर देखता रहा है। इस दूरी को मिटाने के लिए दोनों दलों को मेहनत करनी होगी। अगर ऐसा नहीं होता है तो मतों का बटवारा भी संभव है।

खबरें और लेख पड़ने का आपका अनुभव बेहतर हो और आप तक आपकी पसंद का कंटेंट पहुंचे , यह सुनिश्चित करने के लिए हम अपनी वेबसाइट में कूकीज (Cookies) का इस्तेमाल करते है । हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति (Privacy Policy ) और कूकीज नीति (Cookies Policy ) से सहमत होते है ।
OK
Ad Block is Banned