और इस तरह सैनिक से आजाद हिंद फौज के कर्नल निजामुद्दीन बन आजमगढ़ के शैफुद्दीन 

और इस तरह सैनिक से आजाद हिंद फौज के कर्नल निजामुद्दीन बन आजमगढ़ के शैफुद्दीन 

कर्नल ने नेता जी को बताया था सेना मे हैं कुछ गद्दार ...

आजमगढ़. कर्नल निजामुद्दीन एक ऐसी सख्शियत जो आज मर कर भी अमर हो गई। वैसे तो इनके साथ कई कहानियां जुड़ी है। लेकिन कम ही लोग इनके शैफुद्दीन से कर्नल निजामुद्दीन बनने के सफर के बारे जानते हैं। कुछ महीने पहले कर्नल ने खुद इस पर से पर्दा हटाया था कि एक सामान्‍य परिवार का युवक जो घर से भागकर रोजीरोट के लिए सिंगापुर अपने दादा के पास गया था कैसे अग्रेज सेना के सिपाही से आजाद हिंद फौज का कर्नल निजामुद्दीन बना और नेताजी सुभाष चंद बोस का इतना करीबी हो गया कि नेताजी ने अपना कोई राज उनसे राज नहीं रखा। वैसे निजामुद्दीन के जीवन का एक दुखद पहलू भी है। कनर्ल अपने जीवन में न तो स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा प्राप्‍त कर सके और ना ही दुनिया का सबसे बुजुर्ग होने के बाद भी उनका नाम गिनीज बुक अथवा लिम्‍काबुक में आ पाया।
 
 
1 जनवरी 1900 को ढंकवा में हुआ जन्‍म
 
शैफुद्दीन उर्फ कर्नल निजामुद्दीन का जन्‍म 01 जनवरी 1900 को मुबारकपुर थाना क्षेत्र के ढकवां गांव में हुआ था। शैफुद्दीन सामान्‍य परिवार के थे। दादा सिंगापुर में कैं‍टीन चलाते थे। जिससे इनके परिवार को भरष पोषण होता था।
13 साल की उम्र में छोड़ दिया था घर
 
पारिवार की माली हालत और दादा तथा पिता का जिम्‍मेदारियों में हाथ बटाने के लिए 13 वर्ष की उम्र में शैफुद्दीन घर से भागकर सिंगापुर अपने दादा इस्लाम अली के पास चले गये थे। कुछ दिन तक दादा के साथ कैंटीन में काम किया फिर दाना ने उन्‍हें ब्रिटिश आर्मी में भर्ती करा दिया लेकिन शैफुद्दीन को अंग्रेजों से घृणा थी इसलिए उनहोंने नौकरी छोड़ दी।
 
 
1925 में नाम बदल आजाद हिंद फौज में हुए शामिल

प्रवासीय भारतीयों को आईएनए से जोड़ने के लिए जहाज से पर्चे गिराये जाते थे। वहीं पर्चा देखकर शैफुद्दीन नेताजी के साथ जुड़ने की प्रेरणा मिली थी 1925  में सिंगापुर में ही निजामुद्दीन के नाम से आजाद हिंद फौज में शामिल हुए थे। इसके बाद इन्हें  नेताजी के सानिध्य में काम करने का मौका मिला। 1943 में जाहबालू द्वीप सिंगापुर के सुल्तान ने नेताजी को 12 सिलेंडर की लिंकिंग जाफर नाम की कार भेंट की। इसके बाद नेताजी ने वह कार चलाने की जिम्मेदारी  निजामुद्दीन का सौंप दी।
 
वर्मा के टाइची में बचाई थी नेताजी की जान

नेताजी के चालक के रूप में काम करते हुए निजामुद्दीन ने वर्मा के टाइची में नेताजी को बचा बचाई थी। नेताजी पर हुए हमले से बचाते समय निजामुद्दीन को तीन गोलियां लगी थी।
उस समय नेताजी ने कहा था कि निजामू तूमने मुझे दूसरा जन्म दिया है।
 
नेताजी ने दी कर्नल की उपाधि
जब कर्नल ने नेताजी की जान बचाई उसके बाद उन्‍होंने निजामुद्दीन को कर्नल की उपाधि दी। इसके बाद नेताजी उन्‍हें अपना अंगरक्षक बना दिया।
 
 
नेताजी को किया था आगाह

कुछ दिन पूर्व खुद कर्नल ने खुलासा किया था कि इंफाल की मोरे नदी की लड़ाई के दौरान उन्‍होंने नेताजी को बताया था कि हमारे साथ कुछ गद्दार है। जिनकी वजह से हम लड़ाई हार जायेंगे। उस समय नेता जी ने कहा था कि मुझे पता है लेकिन गद्दारों की खबर बाद में ली जाएगी। इस समय कुछ किया गया तो सेना बिखर जायेगी।  उस समय कर्नल और आजाद हिंद फौज अन्‍य सिपाही वर्मा के टाइची में सुरंग बनाकर रहते थे और रात में छापेमारी करते थे। कोई भी सूचना अदान प्रदान करने के लिए कोयल की आवाज निकाली जाती थी।
 
 
 
गुलेल से सीखा था निशाना लगाना

अंग्रेज नेताजी से भय खाते थे। एक बार वर्मा के जंगल में अंग्रेज अफसर का काफी आतंक था। वह इन्हें दिख गया। नेताजी के कहने पर कर्नल ने उसके माथे पर गोली मारी थी। तब नेताजी ने पूछा था इतनी दूर से निशाना लगाना कैसे सीखे तो कर्नल ने बताया गांव में गुलेल से।  
 
 
कर्नल ने कभी नहीं माना नेताजी की हो चुकी है मौत 

कर्नल निजामुद्दीन जबतक जीवित थे उनहोंने कभी नहीं माना कि 18 अगस्त 1945 को प्लेन क्रैश में नेताजी की मौत हुई थी। बल्कि यह दावा करते रहे कि नेताजी ने अपने मौते की खबर खुद अखबार में पढ़ी और रेडियों पर सुनी थी। यहीं नहीं कर्नल आजीवन यह दावा करते रहे कि 20 अगस्त 1945 को सितांग में नेताजी  से उनकी आखिरी मुलाकात हुई थी। इसके बाद खुद नेताजी ने अपने सुरक्षित लौटने खबर वायरलेश से दी थी।
 
 
दो दशक पूर्व तक करते रहे नेताजी की तलाश

कर्नल निजामुद्दीन वर्ष 1955 में नेताजी के तलाश में रंगून से कोलकाता आये थे। उस समय वे नेता जी के परिवार के लोगों से मिले थे लेकिन उन्हें नेताजी के संबंध में कोई जानकारी नहीं मिली थी। उन्‍हें उम्‍मीद थी कि कभी न कभी उनकी मुलाकात नेताजी से अवश्‍य होगी। इसके बाद वर्ष 1990 में कर्नल कानपुर जाकर कर्नल कैप्टन लक्ष्मी सहगल से मिले थे।
 
 
फाइल सार्वजनिक होने से थे बहुत खुश

केंद्र सरकार द्वारा नेता जी से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक किये जाने से कर्नल बहुत खुश थे। उनका मानना है कि यह कार्य आजादी के तत्काल बाद हो जाना चाहिए था। ताकि लोग उस महान हस्ती के बारे में जान और समझ सकते। 
 
कर्नल को नहीं मिला स्‍वतंत्रता सेनानी का दर्जा

देश की आजादी में अहम भूमिका निभाने वाले कर्नल को खुद को स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानी साबित करने के लिए आजीवन मेहनत करनी पड़ी। पिछले दो वर्षो में प्रशासन ने भी सहयोग किया लेकिन अभी तक कोई परिणाम नहीं निकला। अब कर्नल ही इस दुनिया में नहीं रहे।
 
 
 
 
वर्ष 2016 में पहली बार खुला खाता

कर्नल आजीवन निजामुद्दीन के नाम से एक अदद बैंक एकाउंट भी नहीं खोल सके थे। एक वर्ष पूर्व 2016 में उनका और उनकी पत्‍नी अजीबुन्‍ननिशा का संयुक्‍त खाता स्‍टेट बैंक मुबारकपुर में खोला गया। उम्‍मीद थी कि शायद जिंदगी के अंतिम दौर में उन्‍हें कोई सरकारी सहायता मिल जाय लेकिन ऐसा नहीं हुआ और स्‍वतंत्रता सेनानी बनने की हसरत दिल में लिए कर्नल दुनिया को अ‍लविदा कर गए।

2014 में मोदी ने लिया था आर्शीवाद

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा पीएम पद के उम्‍मीदावर नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में कर्नल से आर्शीवाद लिया था। उस समय उन्‍हें सम्‍मानित भी किया गया था लेकिन पीएम बनने के बाद मोदी ने कभी उनकी सुध नहीं ली।
 
सामाजिक कार्यो में लेते थे बढ चढ़कर हिस्‍सा

117 साल की उम्र में भी कर्नल निजामुद्दीन सामाजिक कार्यो में बढ़ चढ़कर हिस्‍सा लेते थे। चाहे विकास का मामला हो या‍ फिर मतदाता जागरूकता अथवा विश्‍वविद्यालय आंदोलन निजामुद्दीन ने हमेशा अपना समर्थन दिया। अभी तीन दिन पूर्व भी वे मतदताओं को शत प्रतिशत मतदान के लिए प्रेरित करते दिखे थे।  
 
गिनीज बुक में भी नहीं दर्ज हुआ नाम

कर्नल निजामुद्दीन दुनिया के सबसे बजुर्ग व्‍यक्ति माने जाते थे। वे एक जनवरी 2016 को ही 115 साल के हो गए थे। जबकि गिनीज बुक आफ वर्ल्ड में सबसे बुजुर्ग के नाम पर जापान की मिताओं का नाम दर्ज था जिनकी 115 वर्ष की आयु में मौत हो गई थी। इसलिए उसी समय इनका नाम दर्ज कराने के लिए रोटरी क्लब द्वारा गिनीज बुक आफ वर्ल्ड एवं लिम्का बुक आदि संस्थाओं को पत्र लिया गया था लेकिन बात आगे बढ़ती इससे पहले कर्नल का आज भोर में निधन हो गया।
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