तमसा कुंवर के इसी संगम पर स्थित है दत्तात्रेय धाम

कलयुग में भी प्रासंगिक है सतयुग के महर्षि दत्तात्रेय का सन्देश। विष्णु के अवतार माने जाने वाले मुनि दत्तात्रेय सनातन के साथ अघोर विद्या के भी भण्डार थे

By: Ruchi Sharma

Published: 22 Jan 2016, 08:27 AM IST

आजमगढ़. कलयुग में भी प्रासंगिक है सतयुग के महर्षि दत्तात्रेय का सन्देश। विष्णु के अवतार माने जाने वाले मुनि दत्तात्रेय सनातन के साथ अघोर विद्या के भी भण्डार थे। शायद यही कारण है आज भी उन्हें भगवान शंकर के बाद आदि गुरू कहा जाता है। खास बात तो यह है कि सतयुग में जब पेड़ व जल स्रोतों की कोई कमी नहीं थी तब भी वे धर्म कार्य के साथ जल व पर्यावरण संरक्षण तथा दान की शिक्षा दिये थे।


निजामाबाद कस्बे के करीब स्थित कुंवर व तमसा नदी के संगम पर कभी अत्रि मुनि के पुत्र महर्षि दत्तात्रेय ने घोर तपस्या की थी। वे तंत्र, मंत्र, अघोर संत परम्पराओं एवं अन्य विधाओं की दृष्टि से भगवान शिव के बाद आदि गुरु माने जाते हैं। इनकी आराधना से सौ पापों का नाश होता है और व्यक्ति को भोग व मोक्ष दोनों प्रदान होता है। दत्तात्रेय की तपोस्थली पर आज भी भव्य मंदिर है। यहां ध्वनि तरंगों से उत्पन्न शिव लिंग स्थापित है। मुनि दत्तात्रेय द्वारा अन्न दान, पोध रोपण, वस्त्र दान, देवालय, तालाब, कूप, निर्माण की जो महत्ता आज से हजारों वर्षों पूर्व बतायी गयी है जो आज भी बेहद महत्वपूर्ण एवं प्रासंगिक है।

इस धाम की उपेक्षा के चलते आज तक अपेक्षित विकास नहीं हो सका। कार्तिक पूर्णिमा के दिन यहां भव्य मेले का आयोजन होता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार सती अनुसुइया एवं अत्रि मुनि के पुत्र महर्षि दुर्वासा 12 वर्ष की आयु में चित्रकूट से चलकर फूलपुर तहसील क्षेत्र के वर्तमान गांव बनहर मय चक गजड़ी के पास तमसा-मंजूसा के संगम पर पहुंचे थे। उनके साथ उनके छोटे भाई दत्तात्रेय और चन्द्रमा भी आये थे। दुर्वासा ने तमसा-मंजूसा के संगम को अपनी तप स्थली बनायी। वे सतयुग, त्रेता, द्वापर युग तक उक्त स्थान पर रहे। कलयुग के प्रारम्भिक काल में तप स्थल पर ही अंर्तध्यान हो गये।


महर्षि दत्तात्रेय ने दुवार्सा धाम से लगभग 10 किमी आगे निजामाबाद कस्बे के करीब तमसा-कुवंर नदियों के संगम पर तप किया। बाद में उस स्थान का नाम दत्तात्रेय धाम पड़ा। दत्तात्रेय की अराधना से सौ पापों का नाश होता है। वे भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करते हैं। उन्होंने आदि काल में ऋषियों मुनियों तथा आचार्यों को ज्ञान व उपदेश देकर कृतार्थ किया। महर्षि दत्तात्रेय ने भगवान परशुराम को श्री विद्या मंत्र प्रदान किया। यही नहीं भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय को भी इन्होंने अनेक विद्या प्रदान की। संस्कृति मुनि को अघोर मार्ग का ज्ञान दिया। दत्तात्रेय ने कार्तवीर अर्जुन की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें ध्वनि बल से सम्पन्न हजारों हाथों वाला सहस्त्रार्जुन बना दिया। इसी त्रिपुरी नरेश सहस्त्रार्जुन ने महाप्रतापी रावण को परास्त किया था।

नागार्जुन को उन्होंने रसायन विद्या का ज्ञान दिया, तो गुरु गोरखनाथ को योग शिक्षा इनके द्वारा ही दी गयी। नारद पुराण के अनुसार मुनि दत्तात्रेय ने कलचुरी सम्राट को पौधरोपण, अन्नदान, वस्त्रदान, देवालय, तालाब, कूप आदि के निर्माण की महिमा बतायी थी। कथाओं के अनुसार ऋषि दत्तात्रेय हजारों साल तक इस स्थान पर रहे। इसके बाद राजस्थान के जूना गढ़ गिरिनार पर्वत पर गये जहां उनकी पादुका आज भी है। महाराष्टड्ढ्र के गंगापुर में वे अन्तध्र्यान हो गये थे। अवधूत गीता, अवधूतो उपनिषद, मारकण्डेय पुराण, भागवत पुराण, दत्तात्रेय तंत्र, ब्रह्मड्ढवैवर्त पुराण में मुनि दत्तात्रेय के कृतित्व का विस्तार से वर्णन मिलता है। दत्तात्रेय द्वारा पौध रोपण, दान, तालाब, कूप निर्माण की जो महत्ता बतायी गयी थी वह आज और भी प्रासंगिक हो गयी है।

आज भी सुनाई देती है प्रतिध्वनि

मुनि दत्तात्रेय आश्रम पर स्थित शिव के प्राचीन मंदिर में यदि कोई किसी भी मंत्र का जाप करे तो उच्चरित मंत्र विपरीत दिशाओं में काफी दूर तक सुनाई देता है। यदि मंत्र का जाप कुछ समय तक लगातार कर बंद कर दिया जाये तो अपने आप काफी समय तक मंत्र की ध्वनि तरंगें गूंजती रहती हैं। इस शिवलिंग की एक विशेष बात यह भी है कि यह दुर्वासा और चन्द्रमा ऋषि के तपस्थली के मध्य में स्थित है। अपनी इस विशेषता के कारण यह शिवलिंग जिले के लोगों के लिए ही नहीं बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी आस्था का केन्द्र है।

आज भी थाने मेें हैं राम-लक्ष्मण व जानकी

मुनि दत्तात्रेय आश्रम से एक दशक पूर्व चोरी हुई राम-लक्ष्मण व जानकी की अष्टधातु की दो जोड़ी मूर्तियां आज भी थाने में पड़ी हैं। जब यह मूर्ति चोरी हुई तो चोरी करने वालों के ऊपर इतनी विपदा आयी कि वह मूर्ति फेंक दिये या तो फिर पुलिस के हत्थे चढ़ गये। जैसा कि लोग बताते हैं कि चंदाभारी निवासी बाल मुकुंद साव (जायसवाल) नाम के एक व्यक्ति ने दत्तात्रेय धाम को अपनी 85 एकड़ भूमि एवं छावनी दान किया था। उन्होंने ही अष्टड्ढधातु की बनी राम-लक्ष्मण व सीता की प्रतिमा धाम में स्थापित करायी। प्रत्येक प्रतिमा का वजन 12-12 किलो है। वर्तमान समय में साव परिवार के लोग देश के विभिन्न हिस्सों में रहते हैं लेकिन वह आज भी मंदिर से जुड़े हैं। इसी तरह गौसपुर दमदियावन गांव की ब्राह्मड्ढण परिवार की महिला जिन्हें दुलहिन के नाम से जाना जाता था, उन्होंने भी 15-15 किलो वजन के अष्टड्ढधातु से बनी राम-लक्ष्मण व सीता की प्रतिमा धाम पर स्थापित कराया था। बाल मुकुंद साव द्वारा स्थापित करायी गयी तीनों प्रतिमाएं वर्ष 1996 में चोरी हो गयीं लेकिन चोर प्रतिमा को पचा नहीं पाये।


उनके घर विपत्ति पर विपत्ति आनी शुरू हो गयी। जानकार बताते हैं कि चोरों के घर में मौत तक होना शुरू हो गयी। फिर क्या था परेशान चोरों ने राम और सीता की मूर्ति को सोढऱी के जंगल में फेंक दिया जबकि लक्ष्मण जी की मूर्ति को दुर्वासा घाम के एक मंदिर में गिरा दिया। यह चर्चा आग की तरह फैली और पुलिस ने मूर्ति को कब्जे में ले लिया। इसके बाद दूसरी चोरी 1998 में हुई। इस बार चोर दुलहिन द्वारा स्थापित तीनों प्रतिमा को चुरा ले गये। तत्कालीन थानाध्यक्ष जेके सिंह ने इन प्रतिमाओं को बलिया से बरामद किया। बरामदगी के बाद लक्ष्मण की प्रतिमा पर कट के निशान पाये गये। इससे यह अन्दाजा लगाया गया कि चोरों ने प्रतिमा की जांच भी करायी थी।

इसे दत्तात्रेय की महिमा ही कहेंगे की चोरी गयी सभी मूर्तियां तीस दिन के अन्दर बरामद हो गयीं लेकिन इसे विडम्बना नहीं तो और क्या कहेंगे कि 11 साल बाद भी यह सभी प्रतिमाएं थाने और मालखाने में पड़ी हैं। वैसे इस मामले में बहुत अधिक जिम्मेदार पुलिस को भी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि मामला आस्था के साथ करोड़ों रुपये की सम्पत्ति से जुड़ा हुआ। सुरक्षा की दृष्टिड्ढ से पुलिस-प्रशासन और मंदिर पर रहने वाले लोग किसी प्रकार का रिस्क लेना नहीं चाहते हैं।

जब आये हनुमान तब शान्त हुए औघड़

दत्तात्रेय धाम पर स्थित औघड़ बाबा की समाधि स्थल को हटाने के लिए तमाम प्रयास हुए लेकिन हर बार लोगों के हाथ असफलता ही लगी। औघड़ बाबा अपनी स्वेच्छा से तब हटे जब बगल में स्थित पीपल के पेड़ पर स्वयं हनुमान जी विराजमान हुए। यह अलग बात है कि बाबा की समाधि स्थल हटते ही प्राचीन पीपल का अस्तित्व भी अपने से समाप्त हो गया। दत्तात्रेय धाम पर मंदिर के बगल में ही औघड़ बाबा रामदास जी की समाधि थी। समाधि और मंदिर के बीच में मात्र एक फिट की जगह थी जिसके कारण मार्ग अवरुद्ध था। लोगों ने मन बनाया कि औघड़ बाबा को मनाकर उनकी समाधि को स्थानान्तरित कर दिया जाये। प्रयास भी हुआ लेकिन औघड़ बाबा इतने नाराज हुए की पूरा मंदिर क्षेत्र हड्डड्ढी और कूड़े-कचरे से भर गया। इस तरह के प्रयास कई बार किये गये लेकिन हर बार ऐसी ही घटना घटी।

सन्त बताते हैं कि औघड़ बाबा का कहना था कि वह मुनि दत्तात्रेय के प्रथम भक्त थे इसलिए वह उनके साथ ही रहेंगे। यही नहीं उनकी समाधि पर चाहकर भी कभी कोई छत नहीं लदवा सका। कारण औघड़ बाबा इसे पसंद नहीं करते थे। 11 जनवरी 2000 को जब राघव जी रामघाट अयोध्या के महंत श्री श्री 1008 सरजू दास जी महाराज ने दत्तात्रेय धाम की कमान सम्भाली तो समाधि को अन्यत्र ले जाने की योजना उन्होंने भी बनायी। उन्होंने पूजन-अर्चन के माध्यम से औघड़ बाबा को मनाया।

पहले तो बाबा नहीं माने लेकिन संगम के किनारे स्थित पीपल के पेड़ पर हनुमान जी का आह्वड्ढान किया गया और हनुमान जी पीपल के पेड़ पर विराजमान हुए तब बाबा अपनी समाधि को कुछ फिट खिसकाने के लिए तैयार हुए। आज यह समाधि कुएं के बगल में स्थित है। प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि 8-9 साल पहले जब हनुमान जी पीपल के पेड़ पर विराजमान हुए थे तो पेड़ के ऊपर पीला प्रकाश व भगवा पताका दिखाई दे रहा था। बाबा की समाधि हटाने के कुछ ही दिनों बाद ही पीपल का पेड़ संगम पर स्थित कुण्ड में अपने आप समाहित हो गया। कुछ समय तक उसकी पत्तियां पानी के ऊपर दिखाई देती थीं लेकिन अब वह भी नजर नहीं आती।

मंदिर के विकास के लिए नहीं उठा कदम

वर्ष 1868 में दत्तात्रेय धाम पर बने मंदिर का जीर्णाेद्धार कराया गया लेकिन इसके बाद से इस धाम के विकास के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया। 10 साल पूर्व क्षेत्रीय विधायक आलम बदी ने 2 लाख रुपये लागत से एक धर्मशाला का निर्माण कराया। इससे श्रद्धालुओं को थोड़ी बहुत राहत जरूर मिली। दो साल पूर्व पर्यटन विभाग द्वारा भी यहां एक धर्मशाला का निर्माण कराया गया लेकिन धाम के विकास के लिए आज तक कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया।

तप लोक है दत्तात्रेय धामरू सरयू दास

दत्तात्रेय धाम को तप लोक कहा जाता है। यहां कोई भी अनुष्ठड्ढान फलदायक होता है। तमसा के किनारे वाल्मीकि ने रामायण की रचना की थी। यह बातें धाम के महंत सरयू दास महराज ने कही। उन्होंने कहा कि आज भी मुझे एक बात सालती रहती है कि पूर्व में चोरी और उसके बाद बरामद प्रतिमाएं आज भी थाने अथवा मालखाने में पड़ी हैं। मैंने अपने स्तर से प्रयास भी किया लेकिन फिलहाल प्रतिमा को मन्दिर में लाने में सफलता नहीं मिल सकी। लोग चोरी की बात कहते हैं लेकिन तब और अब में स्थितियां बदली हैं। आज मन्दिर में दो दर्जन से अधिक लोग हर वक्त रहते हैं। ऐसे में प्रतिमाओं की चोरी अब सम्भव नहीं है। रहा सवाल धाम के विकास का तो इस दिशा में शासन-प्रशासन की तरफ से ध्यान नहीं दिया जा रहा है। जो भी कार्य हो रहे हैं वे भक्तों के सहयोग से होते हैं।
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