हिन्दी के दधिची थे आचार्य चंद्रबली पाण्डेय

हिन्दी के दधिची थे आचार्य चंद्रबली पाण्डेय

आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय की पुण्य तिथि पर आजमगढ़ में संगोष्ठी का आयोजन

आजमगढ़. राष्ट्रभाषा हिन्दी के पक्ष में आन्दोलन के महानायक और भाषा एवं साहित्य उन्नयन संघर्ष में अपना सम्पूर्ण जीवन लगा देने वाले आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय की पुण्य तिथि आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय स्मृति समिति के तत्वावधान में संस्था के राहुल नगर स्थित कार्यालय पर श्रद्धापूर्वक मनायी गई। इस अवसर पर एक संगोष्ठी का भी आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता संस्था के अध्यक्ष पं. अमरनाथ तिवारी तथा संचालन प्रभुनारायण पाण्डेय‘प्रेमी’ ने किया। 



वक्ताओं ने आचार्य के संतजीवन और उनके त्याग की चर्चा करते हुए उन्हें हिन्दी का दधीचि कहा। राष्ट्रभाषा के संग्राम में 1932 से लेकर 1949 तक हिन्दी-अंग्रेजी और उर्दू में लगभग दो दर्जन पैम्पलेटों और दर्जनों गौरव ग्रंथों चर्चा की।



वरिष्ठ साहित्यकार श्री पारसनाथ‘गोवर्धन’ ने आचार्य जी के सम्पूर्ण वांडगमय की चर्चा करते हुए कहा कि ‘तसव्वुफ अथवा सूफीमत’ उनकी प्रसिद्ध रचना है। उनके गौरव ग्रंथों में ‘तुलसीदास’, ‘कालीदास’, ‘शुद्रक’ और ‘केशवदास’ अग्रगण्य है। उन्होनें कहा कि आचार्य जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होनें हिन्दी के क्षेत्र ऐसे कार्य किए जो उनसे पहले किसी के द्वारा नहीं किया गया था।


डा. कन्हैया सिंह ने कहा कि हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा का दर्जा प्रदान कराने में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय को हिन्दी भाषा-भाषी सदैव याद करते रहेंगे। 



पं. अमरनाथ तिवारी ने आचार्य जी के अंग्रेजी-हिन्दी पैम्फलेटों की चर्चा करते हुए कहा कि उनके एक-एक अंक पर षोध प्रबन्ध लिखा जा सकता है। वे राष्ट्रभाषा हिन्दी के अमर सेनानी, सूफी दर्षन के महान व्याख्याता और हिन्दी आदि काल के महान ऋषि थे, जिन्होनें ब्रह्मचर्य जीवन बिताते हुए सम्पूर्ण जीवन हिन्दी को समर्पित कर दिया।



मुख्य अतिथि वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउन्टेंट कलकत्ता, श्री विजय षंकर पाण्डेय ने कहा कि सम्पूर्ण भारत में हिन्दी राष्ट्रभाषा के लिए जीवन पर्यन्त संघर्ष करने वाले आचार्य चन्द्रबली पाण्डेय की एक प्रतिमा जनपद मुख्यालय पर लगनी चाहिए। श्री पाण्डेय ने आचार्य जी के षोध ग्रंथ ‘तसव्वुफ अथवा सूफीमत’ पर विस्तृत प्रकाश डाला।


इस अवसर पर सर्वश्री डा. श्रीनाथ सहाय, रवीन्द्रनाथ तिवारी, जनमेजय पाठक, विजयधारी पाण्डेय, निषीथ रंजन तिवारी, डा. पंकज सिंह, पद्मनाभ श्रीवास्तव, दिलीप अग्रवाल आदि प्रमुख लोगों ने गोष्ठी को सम्बोधित करते हुए आचार्य जी के प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित किया।
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