आजमगढ़ के इस अस्पताल को है इलाज की जरूरत 

आजमगढ़ के इस अस्पताल को है इलाज की जरूरत 
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 सर्पदंश व निमोनिया के उपचार के लिये प्रसिद्ध था अस्पताल, अस्पताल में लगी मशीन खराब

आजमगढ़. सर्पदंश व निमोनिया के उपचार के लिये प्रसिद्ध बड़हलगंज का सरकारी अस्पताल आज बदहाली का शिकार है। वर्षों पूर्व यहां जनता के सहयोग से लगायी गयी निमोनिया व सर्पदंश के उपचार की मशीन की सेक्शन पम्प खराब पड़ी है। डाक्टर भी अस्पताल में अब कभी-कभार ही अस्पताल में पहुंचते हैं। अस्पताल की बिल्डिंग भी जर्जर हो गयी है और अस्पताल में अक्सर ताला बंद रहता है।

बड़हलगंज में 15 बेड के सरकारी अस्पताल का निर्माण 1962 में हुआ। इस अस्पताल के निर्माण से क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था में एक नया अध्याय जुड़ा। 1970 में यहां प्रेमप्रकाश गुप्ता नाम के डाक्टर की तैनाती हुई। क्षेत्रीय लोगों से चंदा लेकर उन्होंने निमोनिया के उपचार के लिये यहां सेक्शन पम्प लगवाया। इसका उपयोग उन्होंने सर्पदंश के उपचार में भी किया। इससे काफी सफलता मिली। श्री गुप्ता के स्थानान्तरण के बाद 1978 में डा. गुलाम हुसैन खान की यहां तैनाती हुई। ये 1985 तक रहे। इन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान सेक्शन पम्प का भरपूर उपयोग सर्पदंश के रोगियों पर किया। 

सर्पदंश के बाद मरीजों में बनने वाला कफ सबसे अधिक हानिकारक होता है। इस विधि से उपचार इतना सफल हुआ कि यहां मरीजों की लाइन लगने लगी। वीरान स्थान पर बने इस अस्पताल के आसपास अच्छी-खासी बाजार हो गयी। दुकान लगने से सैकड़ों लोगों को रोजी-रोटी का मौका मिला लेकिन आज यह अस्पताल बदहाली का शिकार है। 

सेक्शन पम्प खराब पड़ा हुआ है, अस्पताल का भवन जर्जर हो गया है। ऑपरेशन थियेटर हमेशा बंद रहता है। डाक्टर कब आते हैं और कब जाते यह पता ही नहीं चलता है। यहां सिर्फ चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी का परिवार रहता है। अस्पताल की जीर्ण-शीर्ण व्यवस्था के चलते लोग इसके लाभ से वंचित हैं। सर्पदंश के चलते मौत की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं।

अस्पताल में डॉक्टरों का अभाव:
बड़हलगंज  अस्पताल की बदहाली का आलम यह है कि अगर यहां कोई मरीज पहुंच जाय, तो वह उपचार के अभाव में ही मर जायेगा क्योंकि डाक्टर कभी-कभार अस्पताल पर पहुंचते हैं। अन्य कर्मचारियों के नाम पर यहां केवल चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी का परिवार और तीन बकरियां रहती हैं। 

लोगों का कहना है कि जब यह अस्पताल बना था तो काफी उम्मीद जगी थी। जो भी मरीज यहां पहुंचता था, उसे डाक्टर बचा लेते थे। पिछले दो दशक में यहां आने से पहले यह पता करना पड़ता है कि डाक्टर साहब हैं कि नहीं।  स्थानीय सुभाष चौबे का कहना है कि अस्पताल में डाक्टर तो हैं लेकिन वह कभी-कभार ही अस्पताल आते हैं। ऐसे में मरीज लेकर आने से पहले पता लगाना पड़ता है कि आज डाक्टर साहब मिलेंगे या नहीं। उमेश दूबे व केदार यादव का कहना है कि पहले व्यवस्था इतनी अच्छी थी कि अस्पताल मरीजों से भरा रहता था। आज स्थिति इतनी बदतर है कि लोग यहां आने से घबराते हैं।

प्राइवेट अस्पताल में इलाज को मजबूर:
डॉक्टर की कमी के कारण लोगों को प्राइवेट डाक्टरों के यहां उपचार कराना पड़ता है। नेतपुर गांव निवासी बलराम यादव का कहना है कि सर्प दंश उपचार के लिए अस्पताल में लगायी गयी मशीनें मरम्मत व देख-रेख के अभाव में बेकार हो गयी हैं। अस्पताल में उपचार की कोई व्यवस्था नहीं हो सकी है। इसी गांव की राधा ने बताया कि पहले यहां बड़ी संख्या में मरीज आते थे। आसपास के लोगों को रोजगार भी मिल जाता था। अस्पताल के आसपास अच्छी-खासी बाजार लगती थी लेकिन अब तो यहां कभी-कभार ही मरीज पहुंचते हैं। 

मैनुद्दीनपुर निवासी तारकेश्वर पाण्डेय का कहना है कि यह अस्पताल जनपद में ही नहीं बल्कि आसपास के जिलों में भी सर्प दंश के उपचार के मशहूर था। यहां बिहार तक के मरीज आते थे लेकिन अब कोई मरीज आ जाय, तो उपचार करने वाले ही नहीं मिलेंगे और वह मर जायेगा। बड़हलगंज निवासी रामजनम का कहना है कि प्रशासन की नजर भी इस अस्पताल की दुर्व्यवस्था पर नहीं पड़ती है। अस्पताल की हालत इतनी बदतर है कि अस्पताल की तरफ जाने की मरीज हिम्मत नहीं जुटा पाता। 

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