होली में नहीं सुनाई दी फगुआ गीतों की पारंपरिक धुन

होली में नहीं सुनाई दी फगुआ गीतों की पारंपरिक धुन

आधुनिकता के क्रूर पंजों ने दबोच लिया फगुआ और जोगीरा की परंपरा को

आजमगढ़. प्रेम और सौहार्द के त्यौहार होली अब कोरम पूरा किए जाने जैसी हो गई। होली में त्यौहारों का रंग तो खूब दिखा पर उसमें हमारी परंपरायें कहीं न कहीं विलुप्त होती दिखीं। आधुनिकता की भागम-भाग में अब ना तो वह माहौल रहा और ना ही वह लोग जो कभी फागुन मास के चढ़ते ही होलियाना मूड में आ जाते थे। बसंत पंचमी के बाद होलिका के लिए वैदिक परंपरा से गाड़ा जाने वाला रेड़ का पेड़ जिसे संवत के नाम से जाना जाता था वह भी अब आधुनिकता के परिवेश में दफन हो गया। होलिका दहन के लिए लकड़ी आदि इकट्ठा तो की जाती है लेकिन पहले जैसी बात अब नहीं दिखती, और ना ही फागुन के महीने में बुजुर्गों और जवानों के मुंह से गाए जाने वाले फगुआ गीत और जोगीरा।

गुजरे जमाने में जनपद के एक गांव का परिदृश्य आंखों के सामने उभर आता है। जहां बचपन में उस गांव में होली खेलने का अवसर मिला। गांव के सरजू सिंह उर्फ़ गवईया काका की पूछ फागुन महीना में विशेष हो जाती थी। जैसे वो उस गांव के राबिनहुड हों। बुजुर्ग होने के नाते उस गांव के युवा उनसे फगुआ गीत गाने की मान मनुहार करने के साथ ही इस परंपरा को निभाने के लिए फगुआ गीत के बारे में उनसे सीखने आते थे। गांव के रघुनाथ उर्फ मास्टर ने उस परंपरा को अपने सहयोगी बिरेंद्र मास्टर के साथ गवईया काका के सानिध्य में आगे बढ़ाया। गवईया काका की मौत के बाद इस परंपरा को रघुनाथ मास्टर ने कुछ सालों तक तो जिंदा रखा, लेकिन उनकी मौत के बाद गांव की यह परंपरा विलुप्त जैसी हो गई।
 
उसी गांव का युवा वर्ग अब फिल्मी होली की धुनों पर डीजे बजाकर कोरम पूरा करता दिखा। ऐसे मौके पर न तो वह प्रेम दिखा  और न ही वो परंपरा। हां इतना जरूर है कि युवा वर्ग डीजे की धुन पर नृत्य करने के लिए अब मदिरा का सेवन करना जरूरी समझता है, जो बीते समय में कभी नहीं देखी गई। गवईया काका की अगुवाई में छोटे से इस गांव में प्रतिदिन किसी न किसी घर फगुआ गीतों का आयोजन होता था। गुड़ का रस और भुने चने के स्वाद के साथ ही होली के अवसर पर परदेस से कमा कर लौटने वाले लोग दरवाजे पर आयोजित कार्यक्रम की खुशी में भांग की ठंडई भी बनवाते थे। ढोलक और मजीरे की धुन पर देर रात तक फगुआ गीत और जोगीरा सुनने को मिलता था। लेकिन इस बार की होली भी परंपराओं से बहुत दूर दिखी। 
 
इस मौके पर गांव के उस घर पर लोगों की विशेष नजर रहती थी, जिस घर में फागुन माह से पूर्व नई दुल्हन ससुराल की दहलीज पर कदम रखे होती थी। आधुनिकता के इस दौर ने इस परंपरा को समाप्त कर दिया। अब लोग होली के त्यौहार पर गले मिलने का कोरम पूरा करते हैं। गांव में लोगों की चहेती भौजाई नाबदान के पानी और गोबर के साथ जब युवा देवरों को दौड़ाती थी तो उस समय का दृश्य आज भी जीवन में पुनर्जीवित हो जाता है। आज के परिवेश में आधुनिकता की इस होली को देखते हुए बार-बार उन दिनों को याद कर चेहरे की रौनक बुझ जाती है। शहरों की जगह अब तो गांव में भी होली के दिन लोग प्रेम और सौहार्द की जगह अनजाने भय के माहौल में त्योहार को मनाने की परंपरा पूरी कर रहे हैं। काश वह गुजरा जमाना फिर वापस लौट आता।
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