किसानों के लिए संजीवनी बन सकती है औषधीय खेती

नीलगाय और आपदाओं का खतरा भी होता है कम

आजमगढ़. प्राकृतिक आपदा और जल स्रोतों की घटती संख्या और खाद बीज की महंगाई से अब पारम्परिक खेती किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित हो रही है। पिछले पांच वर्षों में फसलों का उत्पादन तेजी से गिरा है। ऐेसे में लागत वसूल करना मुश्किल साबित हो रहा है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि किसान पारम्परिक खेती से इतर औषधीय खेती अपनाएं तो यह उनके लिए संजीवनी साबित हो सकता है। 

कारण यह है कि इन फसलों पर आपदा और नीलगाय से भी खतरा कम होता है लागत भी अन्य फसलों की अपेक्षा काफी कम होती है। वैसे उत्पाद के निर्यात की व्यवस्था न होना इस खेती में भी बड़ी बाधा है। बाढ़ व सूखा से होने वाले नुकसान, खाद, बीज व सिंचाई की समस्या एवं नीलगायों के प्रकोप के चलते किसानों की रुचि पारम्परिक खेती के प्रति घटी है। सरकारी आंकड़े के मुताबिक 15 से 18 प्रतिशत फसल को नीलगाय नुकसान पहुंचाती हैं।

औषधीय खेती का लाभ: 
औषधीय खेती में प्राकृतिक आपदा से होने वाले नुकसान का खतरा कम होता है। नीलगाय इन फसलों को नुकसान नहीं पहुंचाती। कम लागत में किसान अच्छी आय प्राप्त कर लेते हैं। इस कारण इसकी तरफ लोगों की रुचि बढ़ी है।

क्या है मुख्य समस्या: 
उत्पाद को सुरक्षित रखने एवं निर्यात की अच्छी व्यवस्था न होना सबसे बड़ी समस्या है। इसका फायदा व्यापारी व कम्पनियां भी उठाती हैं। मसलन वर्ष 2001 में जिले के कम्हेनपुर सहित दर्जन भर गांवों में तुलसी की खेती किसानों ने शुरू की। किसान प्रति बीघा 16 कुण्टल तुलसी की पत्ती का उत्पादन कर लेते थे। कम्पनी पत्ती को स्वयं सुखाती थी। आठ कुण्टल हरी पत्ती से एक कुण्टल सूखी पत्ती तैयार होती थी। किसान को प्रति कुण्टल दस हजार रुपया मिलता था। ऐसे में उसे एक बीघे में आठ से दस हजार रुपये तक का लाभ हो जाता था। जब किसानों ने बड़े पैमाने पर खेती शुरू की तो कम्पनी ने निर्यात की मजबूरी का फायदा उठाया और तुलसी का रेट घटाकर साढ़े सात हजार रुपया कर दिया। पत्ती सुखाने की जिम्मेदारी किसानों पर छोड़ दी। अगर निर्यात की व्यवस्था होती तो किसानों का नुकसान न होता। 

रोजगार का भी है साधन:
तुलसी की खेती करने वाले किसान फसल की निराई गुड़ाई तो कराते ही हैं साथ ही ये मजदूर को पत्ती तोडऩे का प्रति किलो चार रुपये का भुगतान करते हैं। इससे गरीबों को आसानी से रोजगार भी मिल जाता है।

नहीं मिल रहा अनुदान: 
सरकार द्वारा सब्जी की खेती पर किसानों को अनुदान दिया जा रहा है लेकिन औषधीय खेती पर किसी तरह का कोई अनुदान नहीं दिया जा रहा है जबकि यदि अनुदान मिले तो न केवल किसानों की रुचि बढ़ेगी बल्कि गरीब किसान भी आसानी से खेती कर सकेंगे।
 
भविष्य की क्या है योजना: 
औषधीय खेती को बढ़ावा देने के लिए अश्वगन्धा, सर्पगन्धा, सफेद मूसली, सतावर, कालमेट, हर्रे बहेर्रा, घृत कुमारी, तुलसी की खेती को बढ़ावा देने के लिए आने वाले दिनों में कार्यक्रम चलाया जायेगा ताकि खेती में हो रहे नुकसान की भरपाई हो सके। इस योजना के संचालन के लिए प्रस्ताव भी शासन को भेजा गया है। प्रस्ताव स्वीकृत होते ही कार्य शुरू हो जायेगा।

क्या कहते हैं किसान: 
पारम्परिक खेती से हटकर तुलसी की खेती कर दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत बने किसान अंगद सिंह का कहना है कि तुलसी की खेती से काफी लाभ हुआ लेकिन अब उत्पाद का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। महंगाई लगातार बढ़ रही है और तुलसी की कीमत घट रही है। औषधीय खेती को बढ़ावा देने से पहले सरकार को इसके निर्यात की उचित व्यवस्था करनी चाहिए।
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Ashish Shukla
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