यही हाल रहा तो आजमगढ़ में दुर्लभ हो जायेगा दूध का दर्शन

यही हाल रहा तो आजमगढ़ में दुर्लभ हो जायेगा दूध का दर्शन
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लगातार कम हो रही है जिले में पशुओं की संख्या, 16 साल में कम हो गई 104713 गाय, भूसा की कमी और चिकित्सकीय सुविधा का अभाव बन रहा कारण

आजमगढ़. सावधान! अगर यही हाल रहा तो दूध का दर्शन भी दुर्लभ हो जायेगा। कारण कि जिले में दुधारु पशुओं की संख्या लगातार कम हो रही है। इसके पीछे वजह क्या है इस तरफ न तो शासन का ध्यान है और ना ही प्रशासन का। परिणाम सामने है कि जिले की पचास प्रतिशत से अधिक आबादी आयातित दुग्ध उत्पादों पर निर्भर है। पशु पालन को बढ़ावा देने के लिये कोई योजना भी नहीं है। यहां तक कि पशु चिकित्सा व्यवस्था भी दिन प्रति दिन बदतर होती जा रही है। ऐसे में आने वाले समय में यह समस्या और बढऩी तय है। वैसे आंकड़े बताते है कि तीन दशक के बीच लोगों की मांसाहार के प्रति रुचि बढ़ी है। यही कारण है कि बकरी और कुक्कुट पालन की तरफ लोगों का रुझान बढ़ा है।




 
बता दें कि कि जिले की 83 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है। कुल जोत के 83.16 प्रतिशत ऐसे किसान है जिनके पास एक हेक्टेयर से कम जोत है। ऐसे में पशुपालन किसानों के लिए आय का एक बड़ा माध्यम था। गौर करे तो अस्सी के दशक में लगभग 20 प्रतिशत लोग दुग्ध उत्पादन कर अच्छी खासी आय अर्जित करते थे लेकिन शासन प्रशासन का पशुपालन के प्रति उपेक्षात्मक रवैये ने लोगों की रुचि लगभग समाप्त कर दिया है। हालत यह है कि लोग पशुपालन से दूर भाग रहे है।











 
यदि चार दशक में पशुपालन की स्थिति पर गौर करें तो वर्ष 1978 में हुई 12वीं पशु जनगणना के बाद जिले में 1530913 पशु थे। 13वीं जनगणना में इनकी संख्या घटकर 12,13,184 हो गयी। 18वीं पशु जनगणना में पशुओं की संख्या 13,95,171 पायी गई। जो वर्ष 1978 से 135742 कम है। पशुओं के वंश के हिसाब से ध्यान दें तो इस अवधि में गोवंशीय पशुओं में 243815, महिषी वंशीय में 79014 की कमी आई है। जबकि भेड़ की संख्या में 41848, सुअर में 15795 तथा घोड़ा टट्टू की संख्या में 1512 की कमी दर्ज की गयी है। आंकड़े साफ बताते हैं कि पशुपालन के प्रति लोगों की रूचि कम हुई है। इसके पीछे मुख्य कारण चिकित्सकीय सुविधाओं का अभाव एवं शासन की उपेक्षा मानी जा रही है। कारण कि समय से टीकाकरण न होने व उपचार की सुदृढ़ व्यवस्था के अभाव के कारण प्रतिवर्ष पशुपालकों को हजारों रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है।





खासतौर पर बरसात के समय गला घोंटू, ज्‍वर, खुरपका-मुंहपका आदि बीमारियों से सैकड़ों पशुओं की मौत होती है। पिछले दो वर्ष से जिले में खुरपका-मुंहपका का टीका नहीं आया है। पशुपालक देवपार निवासी कल्पनाथ यादव, चकिया निवासी कमला सिंह, अतरौलिया निवासी संजय, निकासीपुर निवासी रामनरायन सिंह आदि का कहना है कि पशुपालन से हमें अच्छी खासी आमदनी होती थी। दूध बेचकर हम हजारों रुपयों की आय करते थे लेकिन चिकित्सकीय सेवा के अभाव व अन्य दुव्‍यवस्थाओं के चलते कभी-कभी भारी नुकसान उठाना पड़ता है। आज एक अच्छे दुधारु पशु की कीमत 35-40 हजार रुपये है। एक छोटी सी बीमारी पशुओं की मौत का कारण बन जाती है। टीकाकरण आदि के लिए इतनी मगजमारी करनी पड़ती है कि अब हिम्मत नहीं पड़ती है कि पशु खरीदें।






वैसे तीन दशक के भीतर मांसाहारियों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। यदि देखे तो वर्ष 1978 में बकरी की संख्या 338812 व कुक्कुट की संख्या 355873 थी। वर्तमान में यह बढ़कर क्रमश: 359359 व 508016 हो गयी है। यानि इस अवधि में बकरी की संख्या में 20547 व कुक्कुट की संख्या में 162143 की वृद्धि हुई है। पशु पालन की तरफ लोगों की कम हो रही रूचि को विशेषज्ञ बड़ा खतरा मान रहे हैं। पशुपालन वैज्ञानिक एलसी वर्मा का कहना है कि यह एक खतरनाक संदेश है। यदि इसी तरह लोग पशुपालन से विमुख होते रहे तो आने वाले समय में दूध का दर्शन भी दुर्लभ हो जायेगा। सरकार को पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए विशेष पैकेज की व्यवस्था करनी चाहिए।

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