बुआ-भतीजा एक होंगे तो इनके खाते में जाएगी मुलायम सिंह यादव की संसदीय सीट...

लोकसभा चुनाव से पहले महागठबंधन की सुगबुगाहट, पिछले चार चुनाव में सपा पर भारी पड़ी है बसपा

By: Ashish Shukla

Published: 10 Feb 2018, 08:12 PM IST

आजमगढ़. लोकसभा चुनाव की आहट के बीच बिहार की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में भी बीजेपी को मात देने के लिए महा गठबंधन की सुगबुगाहट तेज हो गई है। यहां बिहार जैसे मजबूत महागठबंधन के आसार भले ही कम हों, लेकिन सपा और बसपा की बढ़ती नजदीकियों और नेताओं द्वारा आए दिन दिए जा रहे बयान से गठबंधन के आसार बढ़ गए हैं। अगर बुआ और भतीजा की पार्टियों के बीच गठबंधन होता है, तो मुलायम सिंह यादव की संसदीय सीट आजमगढ़ पर बसपा का दावा मजबूत होगा। ऐसे में सपा के स्थानीय दावेदारों के मसूंबों पर पानी फिर जाएगा। कारण कि मुलायम सिंह के आजमगढ़ से चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा के बाद यहां कई दावेदार उभर कर सामने आ गए। वहीं सीट मिलने पर मुलायम के गढ़ में बसपा के पास एक बार फिर मजबूती से उभरने का मौका होगा।


बसपा के पक्ष में है अतीत

गौर करें तो वर्ष 1989 के आम चुनाव में जब कांशीराम तक चुनाव हार गए थे और बसपा को पूरे देश में सिर्फ एक सीट मिली थी, उस समय भी बसपा आजमगढ़ सीट से चुनाव जीतने में सफल रही थी। वर्ष 1993 में सपा के अस्तित्व में आने के बाद यहां सीधी लड़ाई सपा और बसपा में देखने को मिली। वर्ष 2004 तक रमाकांत यादव जिले में सपा के सबसे मजबूत नेता रहे। दो बार वे सपा के टिकट पर सांसद निर्वाचित हुए। वर्ष 1998 के लोकसभा चुनाव में बसपा के अकबर अहमद डम्पी से उन्हें मात खानी पड़ी थी। वर्ष 2004 में रमाकांत बसपा के साथ गये तो आजमगढ़ सीट मायावती की झोली में डाल दी, लेकिन रमाकांत यादव पार्टी में ज्यादा दिन नहीं रह पाए। सन 2007 में बीजेपी में शामिल हो गए। इसके बाद सन 2008 में हुए उपचुनाव में रमाकांत भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरे, बसपा ने एक बार फिर डम्पी पर दांव लगाया और कामयाबी भी मिली। डम्पी ने रमाकांत को हरा दिया लेकिन सपा तीसरे स्थान पर चली गई। वर्ष 2009 के आम चुनाव में रमाकांत ने जीत हासिल कर आजमगढ़ में पहली बार कमल खिलाया। इस चुनाव में बसपा दूसरे और सपा तीसरे स्थान पर रही।

 

By : Ran Vijay Singh

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