अखिलेश यादव और निरहुआ में कौन मारेगा बाजेगी, इस वोट बैंक ने बढ़ाया सस्पेंस, चुनाव के बाद यह हो रही है चर्चा

अखिलेश यादव और निरहुआ में कौन मारेगा बाजेगी, इस वोट बैंक ने बढ़ाया सस्पेंस, चुनाव के बाद यह हो रही है चर्चा
अखिलेश यादव और निरहुआ

Akhilesh Kumar Tripathi | Publish: May, 13 2019 06:46:59 PM (IST) Azamgarh, Azamgarh, Uttar Pradesh, India

ऐसे में कोई यह कह पाने की स्थिति में नहीं है कि कौन जीत रहा है और हार जीत का अंतर क्या होगा।

आजमगढ़. छठे चरण का मतदान संपन्न होने के बाद अब इस बात की चर्चा है कि किसके सिर जीत का ताज सजेगा। भोजपुरी अभिनेता निरहुआ आजमगढ़ का किंग बनेगा या फिर सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव। लड़ाई वर्चस्व की थी और दोनों पक्षों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। वोटिंग पिछले बार से थोड़ी कर जरूर रही लेकिन रमजान और तेज धूप के बाद भी मतदाताओं ने उत्साह साफ दिखा। लेकिन दलित का रूख समझ से परे रहा है। वह क्षेत्र और परिस्थिति के हिसाब से बंटे दिखे। यहीं यहां के चुनाव के सस्पेंस को बढ़ा दिया है। ऐसे में कोई यह कह पाने की स्थिति में नहीं है कि कौन जीत रहा है और हार जीत का अंतर क्या होगा।


कहा जाता है कि आजमगढ़ के लोग धारा के विपरीत चलते हैं। कई बार ऐसा देखने को भी मिला है। वर्ष 1979 के लोकसभा उपचुनाव में में यहां के लोगों ने मोहसिना किदवई को संसद भेज दिया था। इसके बाद वर्ष 1989 के लोकसभा चुनाव में जब बसपा को पूरे देश में बुरी तरह हार मिली थी और पार्टी के संस्थापक कांशीराम तक चुनाव हार गए थे, उस समय आजमगढ़ के लोगों ने बसपा के रामकृष्ण यादव को सांसद चुना था। वर्ष 2009 में यहां के लोगों ने बीजेपी के रमाकांत यादव को जिताकर पहली बार कमल खिला दिया।


इसके बाद वर्ष 2014 के चुनाव में जब पूरे देश में मोदी की लहर थी उस समय यहां के लोगों ने बीजेपी के बजाय सपा मुखिया मुलायम सिंह को सांसद चुना। यह अलग बात है कि मुलायम सिंह मात्र 63 हजार के अंतर से चुनाव जीते थे लेकिन उन्होंने पूर्वांचल में विपक्ष का सूपड़ा साफ होने से बचा लिया था।


वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में जब सपा-बसपा, आरएलडी गठबंधन कर मैदान में उतरे और सपा मुखिया अखिलेश यादव ने यहां से पर्चा भरा तथा कांग्रेस ने उनके खिलाफ प्रत्याशी नहीं उतारा तो यह माना जा रहा था कि चुनाव एकतरफा होगा। कारण कि यह जिला सपा बसपा का गढ़ कहा जाता है और वर्ष 2014 में सपा बसपा को यहां छह लाख वोट मिले थे लेकिन बीजेपी की तरफ से दिनेश लाल निरहुआ को मैदान में उतारने के बाद स्थितियां तेजी से बदली और मतदान के बाद कोई यह दावा करने की स्थिति में नहीं हैं कि कौन जीत रहा है और कितने अंतर से जीत रहा है।


इसके पीछे खास कारण है। सपा बसपा दलित, यादव और मुस्लिम मतों को अपना मानकर चल रही है जो आजमगढ़ में अकेले पचास प्रतिशत है। वहीं बीजेपी सवर्ण अदर बैकवर्ड मिलाकर पचास प्रतिशत मतों पर दावा ठोक रही है। पहले यह माना जाता था कि सवर्णो का वोट पोल नहीं होता इसलिए अखिलेश तीन जातियों के मत हासिल किये तो बड़े अंतर से जीत जाएंगे।


वहीं बीजेपी को निरहुआ की दलितों के बीच लोकप्रियता पर भरोसा था कि वह अगर दस से पंद्रह प्रतिशत दलितों को अपने पाले में कर लेता है तो बीजेपी जीत जाएगी। यहीं वजह है कि गठबंधन और बीजेपी दोनों का पूरा फोकस दलित रहे। चुनाव प्रचार भी इनके इर्द गिर्द सिमटा रहा।


मतदान के बाद राजनीति के जानकारों को दावा है कि दलित ज्यादातर सपा के पक्ष में मतदान किये है लेकिन जिन क्षेत्रों में दलित और यादव के बीच विवाद था वहां दलितों के बीजेपी के साथ भी जाने का दावा किया जा रहा है। दूसरी तरफ माना जा रहा है कि रमजान का असर मुस्लिम मतदाताओं पर पड़ा है। कम से कम पांच से सात प्रतिशत बुजुर्ग मतदाता घर से नहीं निकले है। अंदेशा इस बात का भी जताया जा रहा है कि एक से डेढ़ प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक के मुद्दे से प्रभावित होकर बीजेपी के साथ गई है। यहीं नहीं 2 से तीन प्रतिशत अदर बैकवर्ड और सवर्ण के सपा के साथ जाने की संभावना जताई जा रही है।

इन दावों में कितनी सच्चाई है यह तो 23 मई को ही पता चलेगा लेकिन कोई भी यह कह पाने की स्थिति में नहीं दिख रहा है कि कौन किसके साथ था और जीत कौन रहा है। हार जीत का अंतर क्या होने वाला है। रहा सवाल नेताओं का तो सपा के नेता कह रहे है कि वे 2.5 से 3 लाख मतों से जीत रहे हैं। वहीं भाजपा 15 से 20 हजार मतों के अंतर से जीत का दावा कर रही है लेकिन इनके दावे आम आदमी के गले नहीं उतर रहा है। कारण कि पिछले चुनाव में सपा के लोग अंतिम समय तक मुलायम के चार लाख से जीत का दावा करते रहे लेकिन परिणाम आया तो अंतर सिर्फ 63 हजार का था। उस समय भाजपाइयों के भी सारे आकलन फेल हुए थे और पार्टी दूसरे नबंर पर सिमट गयी थी। बसपा को तीसरा स्थान मिला था।

BY- RANVIJAY SINGH

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