बहराइच में दस माह में जन्मे तीन प्लास्टिक बेबी, रोने पर फट रही थी त्वचा, डॉक्टर हैरान

बहराइच में दस माह में जन्मे तीन प्लास्टिक बेबी, रोने पर फट रही थी त्वचा, डॉक्टर हैरान

Akansha Singh | Updated: 14 Jun 2019, 01:40:26 PM (IST) Lucknow, Lucknow, Uttar Pradesh, India

जिले में दस महीने के अंदर तीसरे कोलोडियन बेबी ने जन्म लिया है।

बहराइच. जिले में दस महीने के अंदर तीसरे कोलोडियन बेबी ने जन्म लिया है। मिहीपुरवा ब्लॉक के गायघाट पीएचसी पर महिला ने कोलोडियन बेबी की शक्ल व रोने पर त्वचा फटती देख वहां की स्टाफ नर्स व महिला दोनों भयभीत हो गए। चिकित्सक ने उसे जिला अस्पताल रेफर कर दिया, लेकिन परिजन उसे घर लेकर चले गए। कुछ घंटे बाद उसकी मौत हो गई। मोतीपुर थाना क्षेत्र के गायघाट निवासी शमीम ने प्रसव पीड़ा होने पर अपनी पत्नी माजिदा बेगम को पीएचसी में भर्ती कराया। स्टॉफ नर्स अनीता देवी की देखरेख में सुबह करीब साढ़े छह बजे प्रसव हुआ तो बच्चे की शक्ल बाघ जैसी देखकर दंग रह गई। इस दौरान स्टॉफ नर्स ने माजिदा को कई बार बच्चे को दिखाने का प्रयास किया, लेकिन उसने नहीं देखा। डॉ. बृजेश स‍िंंह ने परीक्षण कर कोलोडियन बेबी होने की पुष्टि की। शिशु के रोने पर त्वचा फटने से हालत गंभीर देखकर उसे जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया। परिवारजन उसे अस्पताल न ले जाकर घर ले आए, जहां उसकी मौत हो गई।

बहराइच जिला अस्पताल के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर के के वर्मा ने बताया कि कोलोडियन बेबी प्लास्टिक का नहीं होता बल्कि उसके शरीर की खाल प्लास्टिक की तरह होती है जो एक झिल्ली की तरह होती है। बच्चे के हंसने रोने या हाथ पैर हिलाने पर स्किन फटने का डर रहता है। ऐसा तब होता है जब गर्भ में शिशु का संपूर्ण विकास नहीं हो पाता। कभी-कभी इसके लिए मां की लापरवाही जिम्मेदार होती है। इस तरह के बच्चे एक लाख में एक देखने को मिलते हैं लेकिन इधर तराई में संख्या बढ़ी है। इस मामले में शोध की जरूरत है।

10 महीने में तीसरी बार जन्मा प्लास्टिक बेबी

प्लास्टिक बेबी को चिकित्सक अति दुर्लभ बताते हैं लेकिन तराई में एक साल में तीन प्लास्टिक बेबी का जन्म हो चुका है। सात माह पूर्व शहर के एक निजी अस्पताल में बलरामपुर की महिला ने प्लास्टिक बेबी को जन्म दिया था। अब उसकी हालत पहले से दुरुस्त है। माह भर पूर्व खुटेहना स्वास्थ्य केंद्र पर हुजूरपुर क्षेत्र की महिला ने प्लास्टिक बेबी को जन्म दिया। हालांकि नवजात की दूसरे दिन मौत हो गई। अब तीसरा मामला मोतीपुर के गायघाट में सामने आया है।

एक लाख में एक होता है ऐसा बच्चा

बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. हिमांशु भूषण बताते हैं कि क्रोमोसोम की समस्या से एक लाख बच्चों में किसी एक बच्चे में यह बीमारी होती है। ऐसे बच्चे की स्किन प्लास्टिकनुमा होती है जो उसके रोने पर फटती है। यही नहीं ऐसे नवजात को संक्रमण का खतरा बना रहता है। एक शोध के अनुसार कोलोडियन बेबी का जन्म जेनेटिक डिस्ऑर्डर की वजह से होता है। ऐसे बच्चों की त्वचा में संक्रमण होता है। कोलोडियन बेबी का जन्म क्रोमोसोम (शुक्राणुओं) में गड़बड़ी की वजह से होता है। सामान्यत महिला व पुरुष में 23-23 क्रोमोसोम पाए जाते हैं। यदि दोनों के क्रोमोसोम संक्रमित हों तो पैदा होने वाला बच्चा कोलोडियन हो सकता है। इस रोग में बच्चे के पूरे शरीर पर प्लास्टिक की परत चढ़ जाती है। धीरे-धीरे यह परत फटने लगती है और असहनीय दर्द होता है। यदि संक्रमण बढ़ा तो जीवन बचा पाना मुश्किल होता है।

कोलोडियन बेबी एक जेनेटिक रोग है

कोलोडियन बेबी या प्लास्टिक बेबी एक जेनेटिक डिसआर्डर है। यदि किसी परिवार में ऐसा बच्चा होता है तो दूसरा बच्चा भी ऐसा ही हो सकता है, इसकी 25 फीसद आशंका रहती है। लेकिन इलाज कराने के बाद गर्भ धारण किया जाए तो काफी हद तक गर्भस्थ शिशु को बीमारी से बचाया जा सकता है। संजय गांधी पीजीआइ में जेनेटिक विभाग की डॉ. शुभा फड़के बताती हैं कि कोलोडियन बेबी एक जेनेटिक रोग है। उन्होंने कहा कि यदि कोई महिला ऐसे शिशु को जन्म देती है तो उसे अगली बार फैमिली प्लान करने से पहले ही इलाज करवाना चाहिए। इलाज से यह संभव है कि दूसरा शिशु स्वस्थ हो। डॉ. फड़के कहती हैं कि पांच हजार किस्म की जेनेटिक बीमारियां होती हैं। कई बार जन्मजात होती है तो कभी कुछ वर्षों के बाद प्रकट होती हैं। सिर पर बाल न होना, होंठ कटा होना, उंगलियां जुड़ी होना, लंबाई बहुत कम होना, स्किन पर छाले पडऩा या कोलोडियन बेबी होना, जिसमें त्वचा खुद ब खुद फटने लगती है। जेनेटिक बीमारियों का उपचार पीजीआइ में उपलब्ध है। बशर्ते लोग समय पर यहां आ जाएं। इसके लिए डॉक्टर्स को भी चाहिए कि वह सही परामर्श देकर उन्हें इलाज के लिए रेफर करें।

क्या है कोलोडियन बेबी

जिला चिकित्सालय के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. केके वर्मा ने बताया कि एक लाख बच्चों में एक बच्चे का प्लास्टिक बेबी के रूप में जन्म होता है। गर्भावस्था के दौरान समुचित विकास न होने के चलते नवजात के शारीरिक आवरण की खाल काफी पतली हो जाती है। जो नवजात के हंसने, रोने, अंगड़ाई लेने पर फटने लगती है। खाल के ऊपर से ही शरीर के अंदर से अंश दिखाई देते हैं। वही प्लास्टिक बेबी की स्थिति बनती है।

खबरें और लेख पढ़ने का आपका अनुभव बेहतर हो और आप तक आपकी पसंद का कंटेंट पहुंचे , यह सुनिश्चित करने के लिए हम अपनी वेबसाइट में कूकीज (Cookies) का इस्तेमाल करते हैं। हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति (Privacy Policy ) और कूकीज नीति (Cookies Policy ) से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned