काटवल की खेती कर १५ से २० हजार कमा रहे बैगा आदिवासी

धान की खेती से अधिक कमा रहे मुनाफा, अन्य किसानों और बैगाओं के लिए बन हरे प्रेरणा श्रोत
काटवल की खेती को प्रोत्साहन देने उद्यानिकी विभाग भी कर रहा प्रयास

By: mukesh yadav

Published: 16 Sep 2021, 08:41 PM IST

बालाघाट. देशी काटवल की खेती कर अब पिछड़ी जाति के बैगा आदिवासी १५ से २० हजार रुपए कमाने लगे हैं। इससे उनकी माली हालात में सुधार आने लगा है। साथ ही आदिवासी क्षेत्रों में काटवल जैसी कई गुण और विटामिन से भरपूर सब्जी मिलने से कुपोषण की रोकथाम व बैगाओं के स्वास्थ्य, सीरत में भी सुधार देखा जा रहा है। देशी काटवल की खेती ने कई आदिवासी बैगाओं की किस्मत बदल दी है।
बिरसा के उद्यान विस्तार अधिकरी हरगोविंद धुवारे के अनुसार देशी काटवल की फसल लगाने में किसी तरह का खर्च नहीं आता है। केवल बांस या लकड़ी का सहारा बेलों को चढ़ाने के लिए लगाना होता है। इसके बाद उसमें किसी तरह के रासायनिक खाद, कीटनाशक एवं दवा की जरूरत नहीं होती है। वहीं काटवल बालाघाट एवं अन्य शहरों में 150 से 200 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बिकती है। उनके द्वारा बिरसा के दूरस्थ आदिवासी बाहुल्य ग्राम मछुरदा में इस वर्ष 25 किसानों के खेतों में काटवल की खेती कराई गई है। इसमें से अधिकांश किसान विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा से है। बैगा किसानों ने अपने घर के पास की बाड़ी में लगभग 10-10 डिसमिल जगह में काटवल के पौधे लगाए हंै। इसकी मात्र 10 डिसमिल की फसल से 45 से 90 दिनों में 15 से 20 हजार रुपए की आय हुई है। धान की खेती से एक एकड़ में भी इतनी शुद्ध आय नहीं होती है।
बीमारियों के लिए बहुपयोगी
डायबिटिज, हाई ब्लड प्रेशर एवं पाईल्स की बीमारी में काटवल बहुत ही उपयोगी है। काटवल की खेती से आदिवासी परिवारों को कुपोषण से भी मुक्ति मिलेगी। काटवल के फलो में पाए जाने वाले पोषक तत्व में कार्बोहाइड्रेट 4.2 ग्राम, प्रोटीन 3.1 ग्राम, वसा 1 ग्राम, खनिज तत्व 1.1 ग्राम, रेशा 3 ग्राम, केल्शियम 33 मिलीग्राम, आयरन 4.6 ग्राम, फास्फोरस 4.2 ग्राम इसके अलावा कैरोटिन, थियामिन, रिबोप्लोविन, नियासिन, एस्कार्बिक एसिड पाया जाता है।
ऐसे करें काटवल की खेती
धुवारे के अनुसार देशी काटवल के पौधे जंगल एवं खेतों में प्राकृतिक रूप से पाए जाते हंै। इसकी फसल माह जुलाई अगस्त में आ जाती है। देशी काटवल के पौधे का कंद होता है, जिससे वर्षा ऋतु में बेले निकलती है। कंद को लाकर लगाने से उसमें बेले तो आती है, लेकिन फल नहीं लगते हैं। काटवल के पौधों में नर एवं मादा दोनों होते हंै। काटवल का फल मादा पौधे में ही लगता है। काटवल के 30 से 40 मादा पौधे लगे हों तो उनके आस-पास 100 मीटर की दूरी के भीतर 04 से 05 नर पौधे होना चाहिए। तभी मादा पौधों में काटवल के फल लगते हंै। काटवल के पौधे 10.1 के अनुपात में मादा एवं नर पौधे लगाना चाहिए। वैसे 100 मीटर दूरी में लगे नर पौधे सें भी कीट, हवा के माध्यम सें मादा पौधे क्रॉस हो जाते हंै।
पांच हजार पौधे तैयार
धुवारे ने बताया कि उद्यानिकी विभाग जंगल में निवास कर रहे पिछड़ी अनुसूचित जनजाति बैगा के लोगों को काटवल की खेती करने की सलाह दी जा रही है और उन्हें काटवल के पौधे शासकीय संजय निकुंज रेहंगी बिरसा से दिए जाएंगे। रेहंगी की नर्सरी में काटवल के लगभग 5000 पौधे तैयार कर पौधे उपलब्ध कराने का प्रयास आरंभ किया जा रहा है। इसमें कृषि विज्ञान केन्द्र बडग़ांव के प्रमुख डॉ आरएल राउत एवं उनकी टीम भी मदद कर रही है।
वर्सन
मैने जंगलों में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले काटवल के जंगल से कंद निकाल कर 25 डिसमिल भूमि में लगाकर माह जून से सितम्बर 3 माह में लगभग 3-4 क्विंटल उपज प्राप्त की है। घर पर ही 100 रुपए प्रति किलोग्राम से बिक्री कर 30 से 40 हजार रुपए की आय प्राप्त की है।
समलू भगवानी, कृषक मछुरदा

भारत सरकार के उद्यानिकी विभाग द्वारा गांवों एवं जंगलों में पैदा होने वाली ऐसे स्वदेशी फल एवं सब्जियों की खेती को प्रोत्साहित करने का निर्णय लिया गया है। जिनमें बहुत अधिक पोषक तत्व होते हंै। केन्द्रीय उद्यानिकी विभाग ऐसी दुर्लभ एवं विलुप्त स्वदेशी फल एवं सब्जी का सवर्धन कर उसकी व्यवसायिक खेती को बढ़ावा देना चाहता है। इसके लिए बालाघाट जिले से देशी काटवल की जानकारी केन्द्रीय उद्यानिकी विभाग दिल्ली को भेजी गई है।
हरगोविंद धुवारे, बिरसा उद्यान विस्तार अधिकरी

mukesh yadav Reporting
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