दुनिया में पहचान बनाएगा जिले में उत्पादित चिन्नौर

एक जिला एक उत्पाद के तहत चिन्नौर का हुआ चयन
उत्पादन बढ़ाने किसानों को किया जाएगा प्रोत्साहित, उपलब्ध करवाया जाएगा बाजार
२-३ हजार हैक्टे. रबके को 15 हजार तक बढ़ाने लक्ष्य
सबकुछ ठीक रहा तो जिले को मिलेगी एक नई पहचान

By: mukesh yadav

Updated: 09 Jan 2021, 11:56 AM IST


इंट्रो:- जिले की माटी में कई शताब्दियों से उत्पादित होने वाले चिन्नौर धान का उत्पादन दो दशक से किसानों ने कम फसल होने से बंद कर दिया था। अब एक जिला एक उत्पाद को प्रमोट करने जिले से चिन्नौर धान का चयन किया गया है। प्रदेश सरकार के इस रोड मेप के तहत चिन्नौर को प्रमोट करने हर स्तर से प्रयास किए जाएंगे। सबकुछ ठीक रहा, तो जिले में उत्पादित चिन्नौर दुनिया के बाजार में अपनी अलग पहचान बनाएगा। जिले को भी नई पहचान मिलेगी।
बालाघाट. जिले में चिन्नौर धान का रकबा बढ़ाने और किसानों को इसके लिए प्रोत्साहित करने वर्षो से प्रयास होते रहे हैं। इन तमाम प्रयासों के परिणाम आज भी नाकाफी ही नजर आते हैं। इसके पीछे का कारण चिन्नौर की खेती को लेकर किसानों में रुची नहीं होना सामने आता है। अन्य धान फसलों की अपेक्षा चिन्नौर धान का उत्पादन कम है। कारण यहीं है की किसान इस फसल की खेती में रुचि नहीं रखते हैं। जिले में धीरे-धीरे कर चिन्नौर का रकबा सीमित होकर कुछ हैक्टेयर तक ही रह गया है। अब शासन प्रशासन चिन्नौर को प्रमोट करने नए सिरे से प्रयास शुरू कर रहे हैं। इनके प्रयास यदि सफल होते हैं, तो देश प्रदेश के लोग भी चिन्नौर के लजीज स्वाद का मजा ले सकेंगे।
गुणों के कारण अलग पचान
वैज्ञानिक डॉ उत्तम बिसेन के अनुसार चिन्नौर का चावल अपने छोटे दाने, मुलायमपन, सुगंध और स्वाद के लिए एक अलग पहचान रखता है। अन्य चावल की तुलना में आयल कंटेट अधिक होता है। यह 160 से 165 दिनों में तैयार होने वाली फसल है। रासायनिक खाद का अधिक उपयोग करने पर इसके पौधे अधिक ऊंचे हो जाते है। अत: केवल जैविक खाद के उपयोग से ही इसका उत्पादन लिया जाना चाहिए।
८० से १२० रुपए तक दाम
डॉ बिसेन ने के अनुसार अन्य धान की तुलना में चिन्नौर का उत्पादन जरूर कम होता है। लेकिन दाम के मामले में यह बाजी मार लेता है और किसान को मुनाफा ही देता है। बाजार में चिन्नौर का चावल 80-90 रुपए से लेकर १२० रुपए प्रति किलो तक बिकता है।
देश प्रदेश में तक मांग
चिन्नौर की डिमांड अन्य जिलों के साथ ही प्रदेशों तक में की जाती है। उत्पादन से अधिक इसकी मांग रहती है। चिन्नौर की मांग और महत्व का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि नौकरी पेशा लोग अपने अधिकारियों को खुश करने, प्रमोशन सहित अन्य लोग अपने काम को साधने में चिन्नौर का सहारा लिया करते हैं।
रकबा बढ़ाने का लक्ष्य
कभी हजारों हैक्टेयर में की जाने वाली चिन्नौर धान की खेती का रकबा अब सिमटकर ०२ से ०३ हजार हैक्टेयर में रह गया है। जिले के दस विकासखंडों में सिर्फ वारासिवनी और लालबर्रा में चिन्नौर की खेती होती हैं। जिले में कृषि महाविद्यालय आने के बाद रकबा बढ़ाने प्रयास किए गए। इस वर्ष दसों विखं में 05 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में चिन्नौर की फसल लगाई गई थी। अब एक जिला एक उत्पाद के तहत चिन्नौर का रकबा 15 हजार हैक्टेयर तक करने का लक्ष्य रखा गया है।
नामी कंपनियां से मिलेगा बाजार
जिले के अधिकारियों के अनुसार चिन्नौर का रकबा बढ़ाने किसानों को तैयार किया जाएगा। साथ ही उन्हें इसका बीज उपलब्ध कराया जाएगा। जैविक रूप से तैयार होने वाले चिन्नौर चावल की पैकिंग व मार्केटिंग के लिए तत्परता से प्रयास किए जाएंगे और एफएसएसएआई लायसेंस के लिए आवेदन किया जाएगा। मार्केटिंग के लिए कृषि उत्पादक संगठन (एफपीओ) बनाकर आईटीसी, रिलायंस, फार्चुन, पतंजली एवं अन्य नामी कंपनियों से अनुबंध कराने के प्रयास किए जाएंगे। जिससे जिले के चिन्नौर उत्पादकों को अधिक दाम मिल सके और बासमती चावल की तरह जिले का चिन्नौर भी अपनी अलग पहचान बना सके।
वर्सन
चिन्नौर के प्राकृतिक रूप से जैविक उत्पादन को प्रोत्साहित करने के संबंध में हमने अधिकारियों से चर्चा की गई। जिले को चिन्नौर चावल के नाम से एक नई पहचान दी जाएगी। जिले में चिन्नौर चावल की खेती का रकबा बढ़ाया जाएगा और चिन्नौर के विक्रय के लिए बाजार उपलब्ध कराने के लिए बड़ी कंपनियों से सम्पर्क किया जाएगा।
दीपक आर्य, कलेक्टर

mukesh yadav Reporting
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