बेटी ने निभाया बेटा का फर्ज, पिता को दी मुखाग्नि

रूढ़ीवादी परम्परा को तोड़ पिता को दी मुखाग्नि

बालाघाट. बेटा वारिस है, तो बेटी पारस है। बेटा वंश है, तो बेटी अंश है। इन पंक्तियों को आज गीता चौधरी ने चरितार्थ कर दिया है। गीता ने ना सिर्फ बेटा बनकर अपने पिता के अंतिम सांस लेने तक उनकी सेवा की है। बल्कि रूढ़ीवादी परम्पराओं को तोड़कर उनके निधन के बाद मुखाग्नि भी दी है। क्षेत्र में ऐसा पहली बार हुआ जब एक बेटी ने मोक्षधाम में अपने पिता को मुखाग्नि दी है। नगर के वार्ड क्रमांक 5 निवासी केशवराव चौधरी (मृतक) का कोई बेटा नहीं था। तीन बेटियां ही है। पत्नी का काफी समय पहले ही देहांत हो चुका है। दो बेटी शांता और ज्ञानता का विवाह हो चुका है। गीता ही बहनों के विवाह के बाद पिता के साथ रहकर सेवा कर रही थी। पिता के निधन पर पुरानी कुरीतियों को तोड़ते हुए गीता ने अपने पिता को न सिर्फ मुखाग्नि दी बल्कि अंतिम संस्कार की हर वह रस्म निभाई, जिनकी कल्पना एक बेटे से की जाती है।
आज भी हमारे समाज में आए दिन कन्या भ्रूण हत्या और दहेज हत्या, बलात्कार के मामले सामने आते है। दरअसल, पुरुष प्रधान समाज की भ्रांति लेकर बेटा-बेटी में अंतर किया जा रहा है। बेटे को आज भी हमारे समाज में परिवार का अहम हिस्सा माना जाता है और बेटी को पराई अमानत मानी जाती है। मगर, इस भेदभाव और भ्रांति को चुनौती देते हुए गीता ने यह साबित कर दिया कि बेटा और बेटी एक समान है। पार्षद डागेन्द्र राउत ने बताय कि गीता के पिता की इच्छा थी कि बेटी ही उनका अंतिम संस्कार करें और उसने अपने पिता की आखिरी इच्छा पूरी की। डागेन्द्र ने कहा समय के साथ सोच बदलने की जरूरत है।

Bhaneshwar sakure Bureau Incharge
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