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पक्की सडक़ बन पाई न मिल रहा स्वच्छ पेयजल

locationबालाघाटPublished: Mar 02, 2024 10:36:19 pm

Submitted by:

Bhaneshwar sakure

दशकों से गांव में बनी हुई है समस्यासुविधाओं के अभाव में जीवन जीना बनी ग्रामीणों की मजबूरीदक्षिण बैहर के वनग्राम चौरिया का मामला

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बालाघाट. गांव पहुंचने के लिए न तो पक्की सडक़ और न ही स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था। हैंडपंप के सहारे जलापूर्ति होती है। गांव में बिजली तो पहुंची लेकिन इस सुविधा का समुचित लाभ नहीं मिल पाता। रात्रि में अंधेरा छाया रहता है। रोजगार के साधन भी नगण्य। स्वास्थ्य सुविधाएं भी नदारद। यह समस्या दशकों से बनी हुई है। बावजूद इसके आज तक इसका निराकरण नहीं हो पाया है। सुविधाओं के अभाव में जीवन-यापन करना ग्रामीणों की मजबूरी बनी हुई है। मामला जिले के अतिनक्सल प्रभावित दक्षिण बैहर के वन ग्राम चौरिया का है।
बैहर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत जनपद पंचायत बिरसा के ग्राम पंचायत चौरिया में एक सैकड़ा से अधिक बैगा आदिवासी निवास करते हैं। यहां की आबादी करीब ढाई सौ है। यह गांव जंगलों और पहाड़ों के बीच बसा हुआ है। गांव में सुविधा के नाम बिजली और मोबाइल टॉवर ही उपलब्ध कराए गए हैं। हालांकि, बिजली का समुचित लाभ नहीं मिल पाता है। बिजली की अघोषित कटौती और लो-वोल्टेज की समस्या अभी भी बनी हुई है। ग्रामीणों ने अनेक बार बिजली, सडक़, पानी की समस्या को लेकर जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों से संपर्क किया। लिखित आवेदन भी दिया। लेकिन किसी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। जिसके कारण समस्या जस की तस बनी हुई है।
तीन हैंडपंप हुए खराब, एक हैंडपंप से हो रही जलापूर्ति
ग्राम पंचायत चौरिया में पेयजल की आपूर्ति के लिए चार हैंडपंप का खनन किया गया है। लेकिन इसमें से तीन हैंडपंप खराब हो गए हैं। एक हैंडपंप से लाल पानी निकल रहा है। मजबूरी में ग्रामीण हैंडपंप के लाल पानी का उपयोग कर रहे हैं। ऐसा नहीं कि ग्रामीणों ने इसकी शिकायत नहीं की हो, शिकायत करने के बाद भी जिम्मेदार इसे गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। जिसके कारण समस्या जस की तस बनी हुई है। ग्रामीणों का कहना है कि ग्रीष्म ऋतु के दिनों में नदी-नालों के पानी का उपयोग किया जाता है।
दशकों से नहीं बन पाई सडक़
वनग्राम चौरिया पहुंचने के लिए आज तक पक्की सडक़ का निर्माण नहीं हो पाया है। नक्सल प्रभावित अतिसंवेदनशीन इस गांव के ग्रामीण आज भी कच्ची सडक़ से ही आवागमन करते हैं। बारिश के दिनों में ग्रामीणों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि एक तो गांव जंगलों के बीच बसा हुआ है, आवागमन के कोई भी साधन नहीं है। ऐसे में जब कोई ग्रामीण बीमार हो जाता है तो उन्हें अस्पताल पहुंचाने के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है।
जर्जर हुआ शाला भवन
ग्राम पंचायत चौरिया में शासकीय प्राथमिक शाला का संचालन होता है। यहां करीब एक दर्जन बच्चे शिक्षा अध्ययन करते हैं। लेकिन विडम्बना यह है कि यह शाला भवन काफी जर्जर हो चुका है। शाला भवन के दरवाजे, खिड़कियां क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। शाला प्रबंधन समिति ने नए शाला भवन के लिए जनप्रतिनिधियों और जिम्मेदार अधिकारियों को पत्र भी लिखा है। लेकिन आज तक इस मामले में कोई सुनवाई नहीं हुई है। जिसके कारण समस्या जस की तस बनी हुई है।
नहीं मिलता रोजगार
ग्रामीणों के अनुसार उन्हें रोजगार नहीं मिल पाता। जीविका उपार्जन के लिए वे वनोपज पर निर्भर रहते हैं। ग्रीष्म ऋतु के दौरान वे रोजगार के लिए पलायन कर लेते हैं। यह समस्या वर्षों से बनी हुई है। पंचायत से भी रोजगार नहीं मिल पाता है।
स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी
जंगलों के बीच बसे इस गांव में ग्रामीणों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पाती है। उन्हें उपचार कराने के लिए या तो स्वास्थ्य केन्द्र लांजी या फिर बिरसा जाना पड़ता है। इसके लिए उन्हें जंगलों से बीच से कच्चे रास्ते से आवागमन करना पड़ता है। इतना ही नहीं आवश्यकता पडऩे पर झोलाछाप डॉक्टरों से उपचार करवाना उनकी विवशता बन जाती है।
इनका कहना है
गांव में चार हैंडपंप है, जिसमें से तीन खराब हो चुके हैं। एक हैंडपंप से लाल पानी आता है। मजबूरी में लाल पानी का ही ग्रामीण उपयोग करते हैं। गांव पहुंचने के लिए पक्की सडक़ नहीं है। रोजगार के साधन नहीं है। शिकायत के बाद भी कोई गंभीरता से नहीं ले रहा है।
-सुंदरलाल उइके, ग्रामीण चौरिया
गांव में शासकीय प्राथमिक शाला का संचालन हो रहा है। दो शिक्षक बच्चों को शिक्षा अध्ययन करा रहे हैं। शाला भवन काफी जर्जर हो चुका है। नए शाला भवन के लिए पत्र लिखा गया है, लेकिन अभी तक कोई सुनवाई नहीं हो पाई है।
-दिनकर धारणे, शिक्षक प्राथमिक शाला

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