एंबुलेंस के इंतजार में बिना इलाज तड़प-तड़पकर मर गई दलित महिला, घरवाले ठेले पर वापस ले गए लाश

यूपी के बलिया में मरीज केा नहीं मिली एंबुलेंस, ठेले पर घरवाले ले गए अस्पताल, नहीं मिला इलाज, ठेले पर ही वापस आई लाश।

बलिया. एक तरफ केन्द्र और राज्य सरकार स्वास्थ्य सेवाओं पर अरबों रुपये खर्च कर इसे बेहतर बनाने का दावा फिर खोखला साबित होता दिखा। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में एक बूढ़ी महिला को एंबुलेंस नहीं मिलने के चलते इलाज के बिना उसकी जान चली गयी। परिजनों ने घंटों एंबुलेंस का इंतजार किया पर उनके मुताबिक फोन करने के बाद भी एंबुलेंस नहीं आयी। परिजन ठेला गाड़ी पर वृद्ध महिा को लेकर अस्पताल तो पहुंचा पर उसने मौके पर ही तड़प-तड़पकर दम तोड़ दिया।


मामला बलिया जिले का है। यहां के गड़वार थानान्तर्गत गोविंदपुर निवासी लीलावती (60 वर्ष) को गुरुवार की सुबह पेट में दर्द उठा तो बेटी-दामाद ने 108 एंबुलेंस को फोन किया। घंटों इंतजार करने के बाद भी एंबुलेंस नहीं पहंची। दर्द से तड़प रही अपनी सास को लेकर दामाद ठेले पर लादकर खींचता हुआ असपताल की ओर भागा। थका-हारा किसी तरह दामाद लीलावती को लेकर स्थानीय अस्पताल पहुंचा तो वहां भी उसको निराशा ही हाथ लगी। अस्पताल में डॉक्टर नहीं थे।

 

 

दामाद ने एक बार फिर इस उम्मीद में 108 नंबर पर फोन किया कि शायद अब एंबुलेंस मिल जाय और जिला अस्पताल ले जाने पर सास का इलाज कर उन्हें बचाया जा सके। पर यहां भी उसे निराशा ही हाथ लगी। एंबुलेंस अस्पताल भी नहीं पहुंची। उधर परेशान बेटी दामाद एंबुलेंस का इंतजार करते रहे और इधर सास दर्द से तड़पती रही। आखिरकार बिना दवा-इलाज के ही दर्द से तड़प-तड़पकर सास लीलावती ने दम तोड़ दिया।


लीलावती की मौत के बाद जब सिस्टम के इस सितम में अधिकारी का पक्ष जानने हमारी टीम बलिया सीएमओ एसपी राय के पास पहुंची तो उनकी उन्होंने कहा ठेले पर मरीज लाने के बजाय एंबुलेंस का इंतजार करना चाहिये। ठेले पर मरीज को लाना नुकसानदेह हो सकता है। हमारे पास एंबुलेंस मौजूद है जो 20 मिनट में पहुंच जाती है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि बहुत अधिक सीरियस मरीज हो तो उसे सीधे संबंधित सीएचसी या फिर जिला अस्पताल ही ले आएं।


सीएमओ साहब ने कहा कि ठेले पर मरीज को लाने के बजाय एंबुलेंस का इंतजार करना चाहिये। पर उन्होंने यह नहीं बताया कि अगर एंबुलेंस न आए तो क्या मरीज को तड़पता हुआ देखें या आंखें मूद लें। यदि समय से एंबुलेंस पहुंच गयी होती तो शायद तो दामाद को ठेले पर लीलावती को खींचकर अस्पताल ले जाना पड़ता और तब लीलावती की जान बच भी सकती थी। कुल मिलाकर सिस्टम के ये सितम गरीब कब तक सहता रहेगा इसका जवाब किसी के पास नहीं। शायद आगे भी सरकारों के दावे और उन दावों को खोखला साबित करती ऐसी तस्वीरें देखने को मिलती रहें, क्योंकि जो व्यवस्थाएं हैं वह ऐसे ही संकेत दे रही हैं।
By Amit Kumar

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रफतउद्दीन फरीद
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