शारदीय नवरात्रि में यहां प्रेत बाधाओं से मिलती है मुक्ति, बुरी आत्माओं को किया जाता है पत्थरों में कैद

शारदीय नवरात्रि में यहां प्रेत बाधाओं से मिलती है मुक्ति, बुरी आत्माओं को किया जाता है पत्थरों में कैद
Navka Bramha Temple

Sarweshwari Mishra | Publish: Oct, 16 2018 10:40:20 AM (IST) | Updated: Oct, 16 2018 10:40:21 AM (IST) Ballia, Uttar Pradesh, India

एक डायन ने दो ब्राह्मण भाइयों को मारकर एक डिबिया में की थी कैद

बलिया. यूपी के बलिया के मनियर में एक ऐसा मंदिर है जहां भूत-प्रेत बाधाओं को हटाया जाता है। शारदीय नवरात्रि में यहां प्राची नवका बाबा मंदिर के सामने स्थित कुंड में उन लोगों को स्नान कराया जाता है जो भूता बाधाओं के बंधन से बंधे हुए हैं। स्नान के बाद प्रेत-आत्माओं को पत्थर की मूर्ति में बांध दिया जाता है।

 

नवरात्र के 9 दिनों में प्राचीन नवका बाबा मंदिर में भूत प्रेत बाधा से भी लोगों को मुक्ति मिलती है नवरात्रि में यहां का माहौल कुछ अलग ही होता है। यहां आने वाले हर शख्श को बड़ी से बड़ी बुरी ताकतों से मुक्ति मिलती है। प्रेत आत्माओं से निजात पाने के लिए यहां दूर-दूर से लोग नवरात्रि में आते हैं।

 

शरीर में होने वाली बीमारियों से भी मिलती है मुक्ति
मंदिर के सामने बने इस कुंड में स्नान करने के बाद इन बुरी आत्माओं को पत्थर की मूर्ति में बांध दिया जाता है। इससे वे लोगों को परेशान नहीं करते। नवका बाबा के मंदिर मे लोगों को खड़ाऊ दान करना पड़ता है। मंदिर के पुजारी के अनुसार क्षेत्र और शारदीय नवरात्र में यहां लोगों का हुजूम लगता है। सिर्फ भूत प्रेत ही नहीं मनुष्य के शरीर में होने वाली विभिन्न बीमारियों से भी लोगों को यहां आने से मुक्ति मिलती है।

 

ये है पूरी कहानी
नवका ब्रह्मा के विषय में बताया जाता है कि बिहार प्रांत के छपरा जनपद (इस समय सिवान जनपद) के चैनपुर गांव में बाल्यावस्था में दो जुड़वा ब्राह्माण भाई पैदा हुए थे। निर्धन परिवार में जन्म लेने के कारण दोनों भाई मेहनत मजदूरी करके अपना भरण-पोषण करते थे। स्थाई रूप से ये दोनों पड़ोसी गांव के ही एक जमींदार राय साहब के यहां रहकर मजदूरी करने लगे। राय साहब के घर के बगल में एक डायन रहती थी जिसने दोनों भाइयों को भोजन पर आमंत्रित करके मारण मात्र से मारकर उनकी आत्मा को एक डिबिया में बंद कर दिया था। कुछ वर्षो बाद उक्त डायन बुढि़या ने अपनी पुत्री की शादी के बाद विदाई के समय वह डिबिया उसे घाघरा नदी में फेंकने के लिए दिया लेकिन वह कतिपय कारणों से नहीं फेंक पाई। ससुराल में पहुंचने के बाद उसने आटा पीसने वाली चक्की के नीचे उसे गाड़ दिया। जब दुल्हन बुढि़या के उम्र की हो गई तो एक दिन चक्की टांगते समय दोनों आत्माएं डिबिया से आजाद हो गईं। उसके बाद घर में आग लग गई। आकाश से खून के थक्के गिरने लगे और चीत्कार होने लगा। परिजन एक तांत्रिक के यहां जाकर दोनों भाइयों को एक पिंड का रूप दे दिए जहां उनका वर्तमान में स्थान है। एक बार बिहार का एक जमींदार गंगा स्नान हेतु लाव-लश्कर के साथ ब्रह्मा स्थान के पास स्थित तालाब में स्नान किया। उसका कुष्ठ रोग ठीक हो गया। इसके बाद उसने यहां एक विशाल मंदिर बनवा दिया तब से लोगों के यहां आने का सिलसिला प्रारंभ हो गया।

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