आप भी मिलिए छत्तीसगढ़ के करमा सम्राट से, 65 साल की उम्र में इन्होंने भारत ही नहीं विदेशों में भी दिलाई करमा को नई पहचान

कोई साथ दे या न दे पर हर परिस्थितियों में दशकों से वे अपनी धुन में पारंपरिक गीत, नृत्य और वाद्ययंत्रों से देश के साथ विदेशों में भी छाप छोड़ रहे हैं।

By: Dakshi Sahu

Published: 04 Jan 2018, 01:02 PM IST

बालोद. आज के डिजिटल युग में भी छत्तीसगढ़ में हमारे ऐसे भी बुजुर्ग कलाकार हैं जो अपनी संस्कृति, अपनी कला और परंपरा को सहेजने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं। आज दिखावे के समय में लोग चाहे किसी भी रूप में अपनी संस्कृति और परंपरा की उपेक्षा या अनदेखी कर रहे हों, पर जमीन से जुड़े हमारे बुजुर्ग कलाकार अब भी अपनी संस्कृति को बचाए रखने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं।

कोई साथ दे या न दे पर हर परिस्थितियों में दशकों से वे अपनी धुन में पारंपरिक गीत, नृत्य और वाद्ययंत्रों से देश के साथ विदेशों में भी छाप छोड़ रहे हैं। इसमें वे काफी हद तक सफल भी हुए हैं। ऐसे ही एक कलाकार से हाल में गंगा मैया झलमला में हुए लोक कला महोत्सव में पत्रिका टीम की मुलाकात हुई। पता चला इन्होंने छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध करमा गीत और नृत्य को सहेजते हुए देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अपनी प्रस्तुति से छत्तीसगढ़ की संस्कृति और परंपरा को अलग पहचान दिलाई।

ये कलाकार हैं बेमेतरा जिले के ग्राम तेंदूभाठा में रहने वाले 65 वर्षीय घनश्याम ठाकुर। छत्तीसगढ़ की संस्कृति और परंपरा को अलग पहचान दिलाने, समाज सेवा में बेहतर कार्य करने के लिए तीन बार राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित भी हुए हंै, तो प्रदेश सरकार सहित अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक और कला संस्थाओं ने इस कलाकार को सम्मानित कर प्रोत्साहित करते रहे हैं।

कलाकार घनश्याम ठाकुर ने बताया वह देश की राजधानी दिल्ली में 15 बार, 7 बार खजुराहो, पंचमढ़ी, कुल्लू मनाली, कोलकाता सहित देश के कोने-कोने तक पहुंचकर प्रस्तुति दी है। घनश्याम कला के क्षेत्र के साथ सामाजिक क्षेत्र में भी सेवा देते हैं और शासन के विभिन्न कार्यक्रमों में अपना सहयोग देते हैं। इनके बेहतर कार्य के लिए इन्हें तीन बार राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित होने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इन्हें 2003, 2005 व 2017 में राष्ट्रपति के हाथों सम्मान मिला है।

करमा सम्राट घनश्याम सिंह ठाकुर से जब पत्रिका टीम ने चर्चा की, तो उन्होंने बताया उनका जन्म 3 नवंबर 1946 को बेमेतरा जिले के तेंदूभाठा में हुआ। सात साल की उम्र में ही उन्होंने करमा गीत और नृत्य से जुड़े और बचपन से ही लगातार अच्छी प्रस्तुति करते कला के क्षेत्र में रम गए।

यही नहीं 1986 के बाद इन्होंने करमा गीत और नृत्य को लोगों तक पहुंचाने के लिए करमा दल झालम नाम से एक समिति बनाकर गांव-गांव व देश भर में महोत्सव में जाकर करमा गीत और नृत्य की प्रस्तुति दी। खजुराहो में जब इन्होंने अपनी प्रस्तुति दी तो इन्हें छत्तीसगढ़ का करमा सम्राट का भी दर्जा मिला।

करमा सम्राट घनश्याम सिंह ठाकुर के करमा की प्रस्तुति सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि देश से बहार विदेशों में भी दी। इन्होंने टोक्यो, बंग्लादेश, अर्जेंटीना, म्यांमार, ओमान में भी करमा नृत्य और गीत का जादू बिखेर कर छत्तीसगढ़ी संस्कृति की छाप छोड़ी। इनकी प्रस्तुति को सरहाना मिली। झलमला के सम्मान समारोह में इस मुर्धन्य कलाकार के लिए कलामर्मज्ञों का कहना था कि पूरे छत्तीसगढ़ में एक अकेला करमा के वास्तविक कलाकार हैं घनश्याम।

लुप्त न होने दें संस्कृति, युवा भटकाव से बचें
आज दिखावे की परिस्थिति को देखते हुए घनश्याम ने कहा आज की चकाचौंध में छत्तीसगढ़ से ही छत्तीसगढ़ की संस्कृति, वेशभूषा लुप्त हो रही है। आज जरूरत है सभी मिलकर अपनी संस्कृति को बचाने की। खासकर युवा वर्ग भटकाव से बचकर अपनी संस्कृति को बचाने में लग जाएं।

Dakshi Sahu
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