देश हो गया आजाद पर आज भी जिंदा है छत्तीसगढ़ के जंगलों में सुभाषचंद्र बोस की सैनिक टुकड़ी, अलग है इनकी सरकार

Dakshi Sahu

Publish: Dec, 07 2017 11:43:38 (IST)

Balod, Chhattisgarh, India
देश हो गया आजाद पर आज भी जिंदा है छत्तीसगढ़ के जंगलों में सुभाषचंद्र बोस की सैनिक टुकड़ी, अलग है इनकी सरकार

आजाद हिंद फौज के संस्थापक सुभाष चंद्र बोस और देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में गठित मांझी सरकार के सैनिक आज भी जिंदा हैं।

बालोद. आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन के संरक्षण व अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए आजाद हिंद फौज के संस्थापक सुभाष चंद्र बोस और देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में गठित मांझी सरकार के सैनिक आज भी जिंदा हैं।

इनके नेतृत्वकर्ता कंगला मांझी (हीरा सिंह देव) के शहादत दिवस पर जिला मुख्यालय बालोद के सरदार पटेल मैदान में बुधवार को छह राज्यों के लगभग दो हजार वर्दीधारी सैनिकों ने उन्हेें सलामी दी। इस दौरान देशभक्ति आयोजनों के साथ धार्मिक कार्यक्रम भी हुए।

जिला मुख्यालय में अनुशासित तरीके से नगर भ्रमण पर निकले दो हजार वर्दीधारी सैनिक देख लोग हैरत में पड़ गए कि आखिर ये सैनिक कहां से आए। बाद में पता चला ये और कोई नहीं बल्कि अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले, शोषण व अन्याय के खिलाफ लडऩे वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कंगला मांझी सरकार की अपनी सरकार के सैनिक हैं।

इस दौरान मांझी सरकार के अनुयायियों द्वारा सरदार पटेल मैदान से जब सैनिकों ने रैली निकली और छत्तीसगढ़ की पारंपरिक नृत्य के साथ पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ नगर भ्रमण में निकले तो लोग दंग रह गए। दरअसल अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले शोषण व अन्याय के खिलाफ लडऩे वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कंगला मांझी सरकार की अपनी सरकार थी, जो आज भी कायम है।

वहीं पांच दिसम्बर को मांझी सरकार के प्रमुख रहे कंगाल मांंझी की 33वीं पुण्यतिथि पर उनके दो हजार सैनिकों ने समाधि स्थल पर एकत्रित होकर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए देश हित में काम करते रहने का संकल्प लिया।

6 दिसम्बर को जिला मुख्यालय में पहली बार ऐतिहासिक रैली निकालकर लोगों को कंगलामांझी को जानने पर मजबूर कर दिया। ब्रिटिशकाल के दौरान से देश की रक्षा सहित अन्य सेवा के कार्य व इनकी कार्यप्रणाली से सभी प्रभावित रहते हैं। इस आयोजन के तहत वे साल में एक बार इस मेले में पूरे गणवेश के साथ अवश्य शामिल होते हैं। इस दौरान इनमें देशभक्ति का जज्बा देखते बनती है।

मांझी के पुत्र केडी कांगे ने बताया कि 1914 में अंग्रेजों ने बस्तर के आदिवासियों को दबाने की कोशिश की थी। इसमें सैकड़ों लोगों की हत्याएं हुर्इं। इसी दौरान जेल में मांझी की मुलाकात महात्मा गांधी से हुई थी। आगे 1920 में कोलकाता में महात्मा गांधी से मिले। इसके बाद मांझी को राष्ट्रीय नेताओं का सहयोग मिलना शुरू हो गया। उन्होंने सुभाषचंद्र बोस के आजाद हिंद फौज की तरह वर्दीधारी सैनिकों की फौज तैयार की।

वर्तमान में मांझी के वर्दीधारी सैनिक पूरे देशभर मेंं फैले हुए हैं जो अपने तरह से देश की सेवा में लगे रहते हैं। मांझी के निधन के बाद उनके सैनिक उनके आंदोलन को आगे बढ़ा रहे हैंं। अभी अखिल भारतीय माता दंतेवाड़ी समाज समिति संगठन द्वारा संचालित हो रहा है। कंगला मांझी 1951 में लाल झंडा फहराया था। 1956 में मांझी को दुर्ग जिले के कचहरी में ध्वज फहराने का गौरव प्राप्त हुआ था।

स्थल पर जुटे मांझी के साथियों ने जानकारी दी कि स्वतंत्रता आंदोलन के समय अंग्रेजों के दमन को कूचलने के लिए आदिवासी समाज के क्रांतिकारी सदस्य मांझी का जन्म बस्तर के तेलावट में हुआ था। उस दौरान अंग्रेजों के अन्याय के खिलाफ 1913 से वे स्वतंत्रता आंदोलन में जुड़ गए और बालोद जिले के डौंडी विकासखंड के बघमार गांव से उन्होंने अपना यह अभियान शुरू किया। बघमार को उन्होंने अपना मुख्यालय बनाया। इस दौरान वे दो साल तक एकांतवास में रहे। उनके राष्ट्रहित आंदोलन से लोगों में एक नया जोश आया। उसके बाद से देशभर में मांझी के सैनिक तैयार होने लगे।

इस दौरान प्रांतीय संचालक भोपाल वीएस सल्लाम ने बताया क्षेत्र के लोगो को अभी भी माझी सरकार के बारे में जानकारी नहीं है। लोगों को इस महान क्रांतिकारी के बारे में जानकारी देने यह आयोजन जिला मुख्यालय में किया गया। यह सैनिक प्रदेश सहित महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, झरखंड से सैकड़ों की संख्या में मांझी सरकार के सैनिक आए थे।

इधर जिला मुख्यालय में आयोजित इस कार्यक्रम में मांझी सरकार नई दिल्ली की अध्यक्ष फुलवा देवी ने मांझी सरकार के सैनिकों को संबोधित करते हुए कहा कंगलामांझी हमेशा गरीबों, आदिवासियों का मसीहा रहे हैं। देश की आजादी में भी बड़ा योगदान दिए। देश आजाद हुआ पर आज भी आजादी के लिए आदिवासी तरस रहे हैं। आज सरकार आदिवासियों के साथ छलावा कर रही है। आज भी उनका हक नहीं मिल रहा। जल, जंगल, जमीन के लिए कई बार सरकार को बोला गया पर किसी ने नहीं सुनी।

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