मदर्स डे पर मिलिए तीन ऐसी माताओं से जो अपने मासूम बच्चों को छोड़कर अस्पताल में 12 घंटे ड्यूटी कर रही ताकि कोरोना से न उजड़े किसी का घर

आज पूरा विश्व मदर्स डे यानी मातृत्व दिवस (Mother's Day 2020) के रूप में मना रहा है। मदर्स डे पर आज हम ऐसे तीन माताओं की कहानी बताने जा रहे है, जो कोरोना महामारी में अपने बच्चों को छोड़कर 12-12 घंटे जिला अस्पताल में सेवाएं दे रही हैं।

By: Dakshi Sahu

Published: 10 May 2020, 12:04 PM IST

बालोद. आज पूरा विश्व मदर्स डे यानी मातृत्व दिवस के रूप में मना रहा है। मदर्स डे पर आज हम ऐसे तीन माताओं की कहानी बताने जा रहे है, जो कोरोना महामारी में अपने बच्चों को छोड़कर 12-12 घंटे जिला अस्पताल में सेवाएं दे रही हैं। बिना डर, भय के सेवा भाव से मरीजों का इलाज कर उन्हें नया जीवन दे रही हैं। महामारी में कोरोना योद्धा की भूमिका निभा रही हंै।

जिला अस्पताल बालोद में तीन ऐसे स्टाफ नर्स हंै जो ड्यूटी के दौरान अपने बच्चों को वीडियो कॉल कर अपनी कमी महसूस नहीं होने देती। प्रसव हो, चाहे गंभीर मरीजों का इलाज यहां बखूबी अपनी जिम्मेदारी निभा रही है। यही नहीं कोरोना अस्पताल में भी क्वारंटाइन किए लोगों का ट्रीटमेंट करके उन्हें संक्रमण से बचाने की भरसक कोशिश कर रही हैं।

मदर्स डे पर मिलिए तीन ऐसी माताओं से जो अपने मासूम बच्चों को छोड़कर अस्पताल में 12 घंटे ड्यूटी कर रही ताकि कोरोना से न उजड़े किसी का घर

तीन साल के बेटे को छोड़कर आती हैं रोज अस्पताल
जिला अस्पताल की स्टाफ नर्स सुनीता देवदास ने बताया कि उनका पहला कर्तव्य ड्यूटी है। उनका बेटा तीन साल का है। ड्यूटी जरूरी है इसलिए बच्चे को सुबह मनाकर उनके पिता, दादा-दादी के पास छोड़कर ड्यूटी पर चली आती है। बच्चे की याद तो आती है लेकिन जब काम में होती हैं तो फोन से बात कर लेती है। अगर अस्पताल में छोटा बच्चा मिले तो उसे देखकर अपने बच्चे की याद आ जाती है। उन्हीं के साथ उनके इलाज के साथ उनकी देखरेख करते ही समय व्यतीत करती हैं। जिससे बच्चे की कमी महसूस नहीं होती।

सबसे ज्यादा जरूरी ड्यूटी
जिला अस्पताल में पदस्थ स्टाफ नर्स बबिता सोनबोइर की तीन साल की बेटी है। अस्पताल में 12 घंटे की ड्यूटी में उनको समय नहीं दे पाती। ऐसे में ड्यूटी आने से पहले उनसे मिलकर आती है। ड्यूटी के दौरान जब उनकी याद आती है तो मोबाइल से वीडियो कॉल कर बेटी का चेहरा देख अपना और मासूम का दिल बहला लेती है। वो कहती हैं कि इस दौर में सबसे ज्यादा जरूरी ड्यूटी है।

घर पहुंचते ही सीने से लिपट जाता है बेटा
जिला अस्पताल की स्टाफ नर्स शिरीन जोसेफ का तीन साल का बेटा है। उन्होंने बताया कि जब वह ड्यूटी आती है तो बहुत रोता है जाने भी नहीं देता पर ड्यूटी तो करनी है। जैसे तैसे उसे मनाकर अस्पताल आ जाती हैं और उनका बेटा अपने पापा के पास रहता है। काम के दौरान बेटे की याद तो आती है लेकिन अस्पताल में मरीजों के इलाज के दौरान उसकी कमी भी महसूस होती है। ड्यूटी से जैसे घर जाओ तो आवाज सुनकर दरवाजे के बाहर आ जाता है। कोरोना महामारी में सीधे मिलने से मना कर देते है तो रोने लगता है। फिर हाथ धोने के बाद वापस आओ तो सीने से लिपट जाता है। मासूम बेटे का यह प्यार देखकर आंखें भर आती है।

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Dakshi Sahu Desk/Reporting
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