बांदा में पाये जाते हैं भगवान राम के पदचिन्ह, यहीं रह कर किया था 14 वर्षों तक जीवनयापन

Akansha Singh

Updated: 12 Sep 2019, 12:23:48 PM (IST)

Lucknow, Lucknow, Uttar Pradesh, India

बांदा. चित्रकूट में रम रहे रहिमन अवध नरेस, जा पर विपदा परत है शो आवे यही देश" जी हां यह पंक्तियां भगवान श्री रामचंद्र जी के जीवन का वर्णन श्री रामचरित मानस में मिलती है। भगवान रामचंद्र जी बुंदेलखंड के चित्रकूट में पहाड़ों पर 14 वर्ष का बनवासी जीवन व्यतीत किया। वहीं इसी मार्ग पर कुछ ऐसे भी पर्वत पड़े जहां पर भगवान ने रात्रि विश्राम कर सुबह वहां से चित्रकूट के लिए प्रस्थान किया था और उनके चरण जहां-जहां पड़े उनके चरण बन गए और वह पदचिन्ह आज भी बांदा के बरुआ सेवड़ा के पहाड़ों पर देखने को मिलते हैं।

बरुआ सोढ़ा पहाड़ है जहां पर भगवान श्री रामचंद्र त्रेता युग में अयोध्या से चित्रकूूट के लिए निकले थे, तो वही बांदा से 22 किलोमीटर की दूरी गिरवां, नरैनी मार्ग पर बरुआ सेवड़ा पहाड़ पर भगवान भोलेनाथ की प्राचीन गद्दी भूतेश्वर के पहाड़ों पर अपना एक रात्रि, मां सीता और छोटेेेे भाई लक्ष्मण के साथ विश्राम किया था और सुबह वह इसी रास्ते से नरैनी व कालिंजर होते हुए चित्रकूट के लिए निकल गए थे और कामदगिरि पर्वत पर 14 वर्ष बनवासी जीवन काटा था। भगवान रामचंद्र ने 14 वर्ष तक पर्वत पर रहे, वह पर्वत कामदगिरि के नाम से पूरे देश में जाने जाना लगा और जहां भगवान ने रात्रि विश्राम किया वह रामचंद्रन छोटा कामदगिरि के नाम से लोगो के लिए आस्था का विषय भी बन गया।

"बादल का बरसना और इनसे नदियों का बहना भी, धरती के इस साथी से है औषधियों का मिलना भी", पहाड़ों का उद्बोधन करतीं ये पंक्तियां परिचायक हैं कि पिता तुल्य ये पर्वत मालाएं मानव कल्याण के लिए ही अस्तित्व में हैं और इन पहाड़ों का आज अस्तित्व हम और आप ही मिलकर नष्ट कर रहे हैं। ये पहाड़ धरती में अनादि कालो की देन मानी जाती है और कहते हैं कि राजा दशरथ ने भगवान श्री रामचंद्र जी को पहाड़ों, जंगलों और असहाय जीवो की रक्षा के लिए ही उनका राजतिलक किया था। भगवान श्री रामचंद्र ने भी इन पहाड़ों में 14 वर्ष तक अपने वनवासी जीवन का यापन भी यही रह करके किया था, लेकिन आज पहाड़ सरकारी तंत्रों की उपेक्षा के चलते ये आज गायब हो रहे है । इन पहाड़ों का सीना छन्नी किया जा रहा है, पर्यावरण असंतुलित तो हो ही रहा है, वही धार्मिक आस्था को भी ठेस पहुंच रही है । जब इन पहाड़ों के विषय में स्थानीय लोगों से बात की तो उन्होंने बताया कि यह पहाड़ों के पट्टे अधिकारियों ने और माफियाओं ने अपने निजी फायदे के लिए ऐसे ऐतिहासिक पहाड़ों का पट्टा कर दिया, जिन्हें दिनदहाड़े बारूद से उनका सीना फाड़ कर के पत्थर निकाला जा रहा है और यह पहाड़ आज पूरी तरह से नष्ट होने की कगार पर है । जो आसपास के पहाड़ बचे हैं उन पर सरकारी तंत्र ने उनका पट्टा करके उनको भी मिटाने में जुटे हैं । लोगोंं ने बताया कि यहां पर भगवान रामचंद्र एक रात्रि का विश्राम किया था और जब भगवान यहां से गए तो उनके पद चिन्ह इन पहाड़ों पर जहां जहां उनके चरण पड़े तो वहां पर वह पद चिन्ह बन गए जिन्हें आज हम लोग और आसपास के इलाकों के लोग उनकी पूजा-अर्चना करते हैं, लेकिन इन माफियाओं ने इन पहाड़ों पर विस्फोट करके उनके पद चिन्ह मिटा दिए हैं और जो बचे हैं उनको भी मिटाने की तैयारी पर है ।

वहीं जब इन पहाड़ों के पट्टों के बारे में खनिज अधिकारी से बात की गई तो उन्होंने बताया कि अभी भी बरुआ सेवड़ा के पहाड़ पर पट्टा चल रहा है जिसकी अवधि अक्टूबर माह तक है, जब वही हमने भगवान रामचंद्र के पद चिन्हों के बारे में बात की तो उन्होंने कहा कि यह पट्टे अभी के नहीं है यह पट्टा पिछले 10 सालों से चल रहा है, अब इसमें कुछ भी नहीं किया जा सकता लेकिन मैं इसकी जांच करवा कर के देखता हूं।

अधिकारियों और माफियाओं की जुगलबंदी कैसे चल रही है इनकी यह तस्वीरें आप लोगों ने देखी लेकिन इन अधिकारियों और माफियाओं को भगवान का भी भय नहीं है। उनके अवशेष इस बुंदेलखंड में जो भी है उनको मिटाने का काम अधिकारी पूरी तन्मयता से जुटे हुए हैं लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि क्या हम आने वाली पीढ़ीयो को पहाड़ और पर्वतों की सिर्फ किस्से ही सुनाएंगे या उन्हें देखने को भी मिलेगे और अगर इस प्राकृतिक चीजों को हम लोग संजो कर नहीं रख पाए तो शायद आने वाला समय बहुत ही भयानक हो सकता है, जिसकी कल्पना ना तो कोई वैज्ञानिक कर सकता है और ना ही कोई मशीन ।

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