वैतरणी एकादशी का व्रत करता है सब ही कष्ट दूर

Ruchi Sharma

Publish: Nov, 14 2017 03:08:06 (IST)

Lucknow, Uttar Pradesh, India
वैतरणी एकादशी का व्रत करता है सब ही कष्ट दूर

वैतरणी एकादशी का व्रत करता है सब ही कष्ट दूर

लखनऊ. सभी व्रतों का अपना एक अलग महत्व होता है। इन सभी व्रतों में एकादशी व्रत का बड़ा महत्व होता है। मार्गशीर्ष के महीने में कृष्ण पक्ष एकादशी को उत्पन्ना एकादशी का व्रत किया जाता है। कार्तिक माह की पूर्णिमा के बाद मार्गशीर्ष माह के 11 वें दिन को उत्पन्ना एकादशी के नाम से जाना जाता है। ये देवउठना एकादशी के अगली एकादशी होती है। एकादशी सभी एकादशी में सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दिन देवी एकादशी का जन्म हुआ था। सभी एकादशी के व्रत भगवान विष्णु की इस शक्ति को समर्पित किए जाते हैं। देवी एकादशी भगवान विष्णु की एक शक्ति का रूप हैं। उन्होनें राक्षस मुर का इस दिन उत्पन्न होकर वध किया था। इसलिए इस एकादशी को उत्पन्ना एकादशी के नाम से जाना जाता है। राक्षस मुर ने भगवान विष्णु को नींद में मारने का प्रयास किया था। इसलिए देवी एकादशी को विष्णु की सभी शक्तियों में से एक शक्ति माना जाता है। देवी वैष्णवी भी विष्णु की शक्ति का रुप हैं। जो लोग हर माह एकादशी का व्रत करते हैं वो इस दिन से अपना व्रत शुरु करते हैं।


विष्णु का अंश है एकादशी

एकादशी के दिन नदी आदि में स्नान कर, व्रत रख कर भगवान श्री हरि के विभिन्न अवतारों की लीलाओं का ध्यान करते हुए इनकी पूजा करनी चाहिए। सनातन धर्म में मनुष्य के चार पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त करने के लिए देवी-देवताओं के व्रत का विधान है। मोक्ष प्रदान करने वाले श्रीहरि का सर्वाधिक प्रिय व्रत है एकादशी।धर्मराज युधिष्ठिर ने इस विषय में भगवान श्रीकृष्ण से पूछा था। तब उन्होंने युधिष्ठिर को बताया था- एक मुर नामक दैत्य था, जिसने इन्द्र सहित सभी देवताओं को जीत लिया। भयभीत देवता शिव से मिले तो उन्होंने श्रीहरि के पास जाने को कहा। क्षीरसागर के जल में शयन कर रहे श्रीहरि इन्द्र सहित सभी देवताओं की प्रार्थना पर उठे और मुर दैत्य को मारने चन्द्रावतीपुरी नगर गए।

चक्र से उन्होंने अनगिनत दैत्यों का वध किया। फिर वे बद्रिका आश्रम की सिंहवती नामक 12 योजन लंबी गुफा में सो गए। मुर ने उन्हें जैसे ही मारने का विचार किया, वैसे ही श्री हरि के शरीर से एक कन्या निकली और उसने मुर दैत्य का वध कर दिया।जागने पर श्री हरि को उस कन्या, जिसका नाम एकादशी था, ने बताया कि मुर को उनके आशीर्वाद से उसने ही मारा है। खुश होकर श्री हरि ने एकादशी को सभी तिथियों में प्रधान होने का वरदान दिया। त्रिस्पृशा, जिसमें एकादशी, द्वादशी और त्रयोदशी तिथि भी हो, वह बड़ी शुभ मानी जाती है।

कोई ऐसी तिथि में एक बार भी एकादशी व्रत कर ले तो उसे एक सौ एकादशी करने का फल मिलता है। हां, दशमी युक्त एकादशी कभी भी नहीं करनी चाहिए। शुक्ल पक्ष की एकादशी में पुनर्वसु, श्रवण, रोहिणी और पुष्य नक्षत्र हों तो बहुत शुभ फल प्रदान करने वाली होती है। सगरनंदन ककुत्स्थ, नहुष और राजा गाधि इसी व्रत को कर जीवन सफल कर सके। जो लोग एकादशी व्रत नहीं कर पाते हैं, उन्हें इस दिन सात्विक रहना चाहिए। एकादशी के दिन लहसुन, प्याज, मांसाहार का सेवन नहीं करना चाहिए। छल-कपट आदि का त्याग भी करना जरूरी है। एकादशी को चावल नहीं खाना चाहिए और सोना नहीं चाहिए। धन होने की स्थिति में दान आदि करना चाहिए। शरीर साथ दे तो रात्रि में जागरण जरूर करना चाहिए।

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