...और बदल गई थाई बोन कैंसर के ढाई वर्षीय श्रीलंकाई बच्चे की जिंदगी

समय गुजरता जा रहा था क्योंकि कीमोथेरेपी की अवधि समाप्त होने के करीब दी और इसके बाद ऑपरेशन जरूरी था।

By: Nikhil Kumar

Published: 07 Jul 2020, 11:51 PM IST

- रोटेशनप्लास्टी सर्जरी के दम पर चिकित्सकों ने बचाया

बेंगलूरु.

थाई बोन कैंसर (cancer of the thigh bone) से जिदंगी और मौत के बीच झूल रहे श्रीलंका के ढाई वर्षीय एक बच्चे को बेंगलूरु में नई जिंदगी (Diagnosed with cancer of the thigh bone, a 2.5-year old boy from Sri Lanka gets a new lease of life in Bengaluru) मिली। रोटेशनप्लास्टी सर्जरी के जरिये चिकित्सकों ने उसे नि:शक्त होने से बचा लिया। श्रीलंका में ही बच्चा कीमोथेरेपी (chemotherapy) पर था लेकिन बेंगलूरु पहुंचने से पहले ही लॉकडाउन (lockdown) घोषित हो गई और वह अपने देश में ही अटक गया।

प्रक्रिया अस्पताल (Prakriya Hospital) के हड्डी कैंसर रोग विशेषज्ञ व सर्जन डॉ. श्रीनिवास चीरुकुरी (Dr. Srinivas Chirukuri ) ने बताया कि बच्चे के पिता ने श्रीलंका में भारतीय दूतावास तक पहुंचने की कई कोशिश की। उन्होंने श्रीलंकाई सरकार से कई बार अनुरोध भी किया कि भारत में फंसे श्रीलंकाई नागरिकों को देश वापस लाने के लिए जो विमान जाने हैं उसमें बच्चे को उपचार के लिए जाने की इजाजत दी जाए। इस बीच अस्पताल प्रबंधन ने भी उपचार संबंधित दस्तावेज बेंगलूरु से भेजे। समय गुजरता जा रहा था क्योंकि कीमोथेरेपी की अवधि समाप्त होने के करीब दी और इसके बाद ऑपरेशन जरूरी था।

इस बीच जून के प्रथम सप्ताह में श्रीलंका से चेन्नई के बीच विशेष उड़ान प्रारंभ हुई और मेडिकल वीजा पर पिता अपने बीमार बच्चे को लेकर चेन्नई पहुंच गए। चेन्नई प्रशासन से विशेष पास मिलने के बाद दोनों सड़क मार्ग से चेन्नई से बेंगलूरु के अस्पताल पहुंचे। पिता और पुत्र को कोरोना संक्रमण के लिए जांचा गया। रिपोर्ट निगेटिव आने के बाद ऑपरेशन की तैयारी शुरू हुई।

डॉ. श्रीनिवास ने बताया कि रोटेशनप्लास्टी (Rotationplasty) नामक सर्जरी हुई। तीन घंटे तक चले इस ऑपरेशन में कैंसर प्रभावित थाई बोन और घुटने के कुछ हिस्से को काटकर निकाला गया। लेकिन ऐसा रक्त वाहिकाओं और नर्भ के जोड़ों को ज्यों का त्यों छोडऩे के बाद किया गया। फिर कटे हुए पांव के निचले हिस्से को जांघ से जोड़ा गया। फिक्सिंग से पहले मरीज के पैर को 108 डिग्री घुमाया जाता है। यह टखने को पीछे की ओर मोड़ता है और इसे विपरीत घुटने के स्तर तक ले जाता है ताकि दोनों घुटने बराबरी पर हों। इसके बाद टखना घुटने की जगह ले लेता है। ऑपरेशन के कारण प्रभावित पांव की लंबाई छोटी हो जाती है। लेकिन कृत्रिम प्रोस्थेसिस की मदद से दोनों टांगों की लंबाई बराबर की गई और बच्चा आत्मनिर्भर होकर चलने लगा।

डॉ. श्रीनिवास ने बताया कि बच्चे बहुत जल्दी खुद को नए पैर के अनुसार ढाल लेते हैं। आम बच्चों की तरह भाग-दौड़ और खेल-कूद सकते हैं। कुछ दिनों में बच्चा श्रीलंका लौट जाएगा। बाकी की कीमोथेरेपी वहीं होगी।

Nikhil Kumar Reporting
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