बच्चे का मन भी कोरे कागज की भांति-आचार्य देवेन्द्र सागर

धर्मसभा का आयोजन

By: Yogesh Sharma

Updated: 13 Sep 2021, 08:37 AM IST

बेंगलूरु. राजस्थान जैन संघ जयनगर में विराजित आचार्य देवेंद्रसागर सूरी ने कहा कि हम कोरे कागज पर जैसा भी लिखना चाहें वैसा ही लिख सकते हैं। बच्चे का जीवन व मन भी कोरे कागज की भांति होता है। जब बच्चा छोटा होता है तभी से उसमें अच्छे संस्कार भरे जा सकते हैं। कपड़ों पर घी की चिकनाहट धोने के बाद भी पूरी तरह से नहीं उतरती। ठीक इसी तरह से व्यक्ति के जीवन में संस्कारों का असर जल्दी से नहीं छूटता। हर इंसान को चाहिए कि वह अपने बच्चों के कोरे मन में केवल संस्कारो के भाव ही भरें। बचपन में संस्कार देने से बच्चा आगे जाकर अच्छा इंसान बनता है तथा देश के काम आता है। संस्कारित पीढ़ी ही समाज राष्ट्र को उच्च शिखर पर पहुंचा सकती है। हमें संस्कारित पीढ़ी छोडऩा है। अगर महापुरुषों का सान्निध्य तथा माता-पिता का आशीर्वाद हमारे साथ रहेगा तो हम पतन की ओर अग्रसर ना होकर उन्नति के पथ पर चलते रहेंगे। वर्तमान समय में आधुनिकीकरण की दौड़ में हर इस कदर बेतहाशा दौड़ रहे हैं कि हमें खुद पता नहीं कि हमें क्या पाना है और क्या खोना है। आए दिन समाज में हम ऐसे कुकृतियों की चर्चा सुनते हैं, जिसे सुनकर हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। इसका बहुत कुछ कारण संयुक्त परिवार की संकल्पना का खत्म हो जाना है। बच्चे घर से ही रिश्तों का महत्व नहीं समझ पा रहे हैं। पाश्चात्य शिक्षा कही न कही हमें संस्कार विहीन बना रही है और इसे हमे ढूंढना होगा कि वो कोन से कारण है जिनकी वजह से हम इस कदर इंसानियत, दया, करूणा प्रेम, परोपकार, सम्मान जैसे मूल्यों को भूलते जा रहे हैं। स्वार्थ इस कदर हावी है कि हम उसे परे सोच ही नहीं पा रहे हैं। आज हमें जरूरत है व्यापक स्तर पर एक आंदोलन चलाने की, वरना वह दिन दूर नहीं जब हमारी संतति के द्वारा ही वह सम्मान नहीं पा सकेंगे,जिनके लिए हमने आने मां बाप को अपनी दुनिया में स्थान न दिया।

Yogesh Sharma Reporting
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