आदमी सदा सुख चाहता है, दु:ख नहीं -आचार्य देवेन्द्र सागर

धर्मसभा का आयोजन

By: Yogesh Sharma

Published: 29 Jul 2021, 10:45 AM IST

बेंगलूरु. आचार्य देवेंद्रसागर सूरी ने जयनगर में आयोजित धर्मसभा में कहा कि सुख, दुख से महान है और कुछ दुख को महान बताते हैं। पर मैं कहता हूं, दोनों एक ही हैं। दोनों साथ आते हैं। जब कोई एक तुम्हारे साथ बैठा हो तो याद रखना दूसरा उस समय तुम्हारे बिस्तर पर सोया हुआ है।’ कभी सुख होता है और कभी दु:ख होता है। आदमी सदा सुख चाहता है, कभी दु:ख नहीं चाहता, पर दु:ख होता है। आखिर सुख निरंतर क्यों नहीं होता। क्या कारण है कि सुख चाहने वाले को दुख मिलता है। लगता है आदमी जीने के लिए सब कुछ करने लगा पर खुद जीने का अर्थ ही भूल गया। प्रश्न है कि सुख और दु:ख प्रकृति क्या है। हमारी मनोवृत्ति, हमारी जीवनशैली, हमारी सोच, और हमारे व्यवहार इसी से सुख और दु:ख उत्पन्न होते हैं। प्रश्न होता है कि सुख-दु:ख का संवेदन क्यों होता है। इसका समाधान यह है कि हमारी मानसिक धारणाओं ने एक विशेष अवस्था का निर्माण किया है। उसी से हमें अनुकूलता और प्रतिकूलता, प्रियता और अप्रियता, हर्ष और विषाद का अनुभव होता है। आदमी भ्रम में जीता है। जो सुख शाश्वत नहीं है, उसके पीछे मृगमरीचिका की तरह भागता है। धन-दौलत, जर, जमीन, जायदाद, जोरू, क्या शाश्वत रहे हैं। फिर हम उन्हें शाश्वत की तरह क्यों मानते है। क्या हमारी यह भ्रमभरी सोच नहीं है कि ये सब मरने के बाद भी हमारे साथ जाएंगे। यही द्वंद्वभरी सोच ही सुख और दुख का कारण है। हर सुख और दुख बन्द आंखों से देखा गया सपना होता है, इसलिए उसका संवदेन नहीं होता। जब अनुकूल बात होती है तब हमारा सुख का संवेदन जागृत हो जाता है और जब प्रतिकूल घटना घटित होती है तब दु:ख का संवेदन जाग जाता है। प्रिय का योग होता है तो सुख का अनुभव होने लगता है और अप्रिय के योग में दु:ख उभर आता है। सुख-दु:ख हमारी सोच से उत्पन्न होने वाली मानसिक धारणाओं के साथ जुड़ा हुआ है।

Yogesh Sharma Reporting
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned