अहिंदा की चमक पड़ी फीकी

दलितों को ज्यादा महत्व देने के कारण भी कांग्रेस को दूसरे वर्गों के मतों का नुकसान हुआ

By: Ram Naresh Gautam

Published: 16 May 2018, 05:35 PM IST

बेंगलूरु. कांग्रेस को सिद्धरामय्या के अहिंदा (दलित, पिछड़ा, अल्पसंख्यक) समीकरण पर काफी भरोसा था लेकिन यह ज्यादा असर नहीं दिखा पाया। अङ्क्षहदा मतों के कांग्रेस और जद ध के बीच विभाजन का फायदा भाजपा को मिला। वोक्कालिगा और लिंगायत मतों के धु्रवीकरण विपरीत अहिंदा समीकरण में विभाजन कांग्रेस को भारी पड़ गया। दलितों को ज्यादा महत्व देने के कारण भी कांग्रेस को दूसरे वर्गों के मतों का नुकसान हुआ। भाग्य योजनाओं की सफलता पर भी कांग्रेस और सिद्धरामय्या को काफी भरोसा था लेकिन वह मत और सीटों में अपेक्षा के मुताबिक नहीं बदल पाया।
कुछ सीटों पर उम्मीदवारों के चयन में चूक के कारण भी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। कुछ अल्पसंख्यक बहुल सीटों पर उपयुक्त उम्मीदवार नहीं उतारे जाने के कारण मतों के विभाजन से कांग्रेस को नुकसान हुआ। बेंगलूरु के चिकपेट में कांग्रेस ने अल्पसंख्यक समुदाय को उम्मीदवार को नहीं उतारा जिसके कारण अल्पसंख्यक मतों का विभाजन हुआ और भाजपा जीत गई। कम से कम एक दर्जन सीटों पर कांग्रेस को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा।

उल्टा पड़ा लिंगायत दांव
कांग्रेस को लिंगायत कार्ड से काफी उम्मीदें थी लेकिन उसका यह दांव उल्टा पड़ गया। लिंगायतों को भाजपा का समर्थक माना जाता है और उसके इसी वोट बैंक मेें सेंध लगाने की कोशिश के तहत कांग्रेस ने चुनाव की घोषणा से ऐन पहले लिंगायतों को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने का कदम उठाया था। कांग्रेस के वार को कुंद करने के लिए भाजपा ने लिंगायत कार्ड को हिंदुओं को बांटने की कोशिश के तौर पर पेश कर उसे भुनाने की कोशिश की और उसका फायदा उसे लिंगायत बहुल इलाकों के साथ ही तटर्वी इलाके मेंं भी मिला। इन इलाकों में कांग्रेस को काफी कम सीटें मिली हैं। कांग्रेस पहले लिंगायतों के जो वोट मिलते थे उसमें इस बार काफी कमी आई और परिणाम पर उसका असर पड़ा।

 

तीसरी बार खंडित जनादेश
राज्य के इतिहास में यह सिर्फ तीसरा मौका है जब ख्ंाडित जनादेश आया है। पहली बार 1983 में खंडित जनादेश आया था जब किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला था। हालांकि, दोनों ही बार गठबंधन सरकार ज्यादा समय तक नहीं चल पाई और दो साल बाद ही मध्यावधि चुनाव कराना पड़ा। ख्ंाडित जनादेश के कारण पहली बार रामकृष्ण हेगड़े के नेतृत्व में गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी। हालांकि, दो साल बाद ही हेगड़े ने विधानसभा भंग कर नया जनादेश लिया और सत्ता में लौटे। इसके बाद 2004 के विधानसभा चुनाव में भी किसी जनता ने किसी दल को बहुमत नहीं दिया और जद ध ने कांग्रेस और भाजपा के साथ अलग-अलग गठबंधन कर 40 महीने तक सरकार चलाई लेकिन मध्यावधि चुनाव कराना पड़ा और भाजपा ने पूर्ण बहुमत के साथ 2008 में वापसी की।

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