संवैधानिक चुनौतियों के चक्रव्यूह में विधानसभा अध्यक्ष

संवैधानिक चुनौतियों के चक्रव्यूह में विधानसभा अध्यक्ष

Sanjay Mohan Kulkarni | Updated: 11 Jul 2019, 06:05:01 PM (IST) Bangalore, Bangalore, Karnataka, India

  • विधानसभा अध्यक्ष के रूप में रमेश कुमार की दूसरी पारी
  • सफल विधानसभाध्यक्ष के रूप में पहचान
  • सदन के नियमों और कार्यवाही का जानकार

बेंगलूरु. अपने राजनीतिक सफर में दूसरी बार विधानसभाध्यक्ष का दायित्व निभा रहे रमेश कुमार इस समय सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती का सामना कर रहे हैं। रमेश कुमार मंत्री भी रहे हैं लेकिन, राज्य की जनता में उनकी एक सफल विधानसभाध्यक्ष के रूप में ही पहचान बनी हुई है।

रमेश कुमार को महज एक राजनेता नहीं बल्कि सदन के नियमों और कार्यवाही का जानकार माना जाता है। पिछले वर्ष जब उनका दूसरी बार विधानसभाध्यक्ष के रूप में चयन हुआ तब सत्तासीन तथा विपक्ष के नेताओं ने रमेश कुमार के संसदीय कुशलता की सराहना की थी।

रमेश कुमार मंत्री भी नहीं थे तब भी उनकी टिप्पणियों को सदन में गंभीरता से सुना जाता था। एक विधायक के रुप में भी उन्होंने कई बार अपनी ही सरकार को फटाकार लगाते हुए उचित मार्गदर्शन किया था।

पिछले वर्ष जब रमेश कुमार ने विधानसभाध्यक्ष के रूप में दूसरी पारी शुरू की तब भी उन्होंने अपने मूल स्वभाव के अनुसार कांग्रेस और जद-एस गठबंधन सरकार को प्रशासनिक त्रुटियों के लिए कई बार फटकार लगाते हुए विपक्ष की सराहना प्राप्त की थी। यहां तक कि बजट सत्र के दौरान जब उन पर परोक्ष रुप से सरकार की आलोचना करने का आरोप लगाया गया था तब भी रमेश कुमार ने त्यागपत्र देने का मन बनाया था।

हालांकि उसके पश्चात सत्तासीन तथा विपक्ष के नेताओं ने एक सुर में रमेश कुमार के निष्पक्षता की सराहना करते हुए उनसे पद पर बने रहने की अपील की जिस कारण रमेश कुमार ने त्यागपत्र देने का फैसला टाला था। चौदह विधायकों के इस्तीफे के बाद मौजूदा राजनीतिक हालात में मंजे हुए संसदीय विशेषज्ञ रमेश कुमार की एक विधानसभा अध्यक्ष के रूप में अग्निपरीक्षा हो रही है।

रमेश कुमार पर सदस्यों का भरोसा इससे भी समझा जा सकता है कि विधायक पद से त्यागपत्र देने वाले हिरेकेरुर क्षेत्र के कांग्रेस विधायक बीसी पाटिल ने रमेश कुमार की तुलना एक न्यायाधीश के साथ करते हुए सटीक फैसले की कामना व्यक्त की है। कांग्रेस तथा जद-एस विधायकों के त्यागपत्रों की स्वीकृति पर लिया जाने वाला रमेश कुमार का फैसला एक लैंड मार्क के रूप में इतिहास में दर्ज होगा।

अनावश्यक देरी का आरोप
राजनीतिक विश्लेषक रमेश कुमार पर इस मामले में अनावश्यक देरी का आरोप लगा रहे हैं। कर्नाटक उच्च न्यायालय के अधिवक्ता संघ के पूर्व अध्यक्ष एस. सुब्बा रेडडी के मुताबिक रमेशकुमार के पास केवल सीमित विकल्प है। इस मामले में रमेश कुमार को केवल इस बात की पुष्टी करनी है कि क्या त्यागपत्र देनेवाले विधायक पर किसी ने दवाब लाया है? क्या यह त्यागपत्र विधायक ने स्व प्रेरणा से नहीं दिया है? इन दो मानदंडो के अलावा विधानसभा अध्यक्ष को छानबीन का और कोई अधिकार नहीं है।

क्या कहते है विस के पूर्व अध्यक्ष
विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष केआर पेट कृष्णा के मुताबिक विधायकों के त्यागपत्र स्वीकृत करने से पहले विधानसभाध्यक्ष का यह दायित्व होता है कि वह इस पर संतुष्ट हों कि त्यागपत्र देने वाला विधायक किसी के दबाव में आकर त्यागपत्र नहीं दे रहा है। अगर विधायक अपनी प्रेरणा से त्यागपत्र दे रहा है तो ऐसे त्यागपत्र को स्वीकृत करने के अलावा विधानसभा अध्यक्ष के सामने दूसरा कोई विकल्प नहीं है। किसी के दबाव के बगैर दिए गए त्यागपत्र को विधानसभाध्यक्ष तकनीकी बहाने से लंबित नहीं रख सकते है।

विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष कागोडु तिम्मप्पा के मुताबिक संदिग्ध राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में विधायकों के त्यागपत्र स्वीकृत करने में देरी के अलग अर्थ लगाए जाने की संभावनाओं को देखते हुए ऐसे त्यागपत्रों की मानदंडो के तहत तुरंत छानबीन कर विधानसभा अध्यक्ष को फैसला करना चाहिए। विधायक ने बिना किसी दवाब से आकर त्यागपत्र सौंपा है तो ऐसे त्यागपत्र या त्यागपत्रों की स्वीकृती में देरी करना अतार्तिक साबित होगा।

साथ में विधानसभा अध्यक्ष की निष्पक्षता भी सवालों के घेरे में आएगी। हालांकि ऐसे त्यागपत्र की स्वीकृति के लिए कोई समय सीमा भी तय नहीं है।

विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष केबी कोलिवाड के मुताबिक विधायकों के त्यागपत्र पर विधानसभाध्यक्ष 2-3 दिनों में फैसला कर सकते हंै। त्यागपत्रों की जांच के नाम पर 15-20 का समय लेना ठीक नहीं है। क्योंकि इस मामले में विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका सीमित है।

जब सदन की कार्यवाही चल रही हो तो इस दौरान किसी राजनीतिक दल के व्हिप का उल्लंघन करनेवाले सदस्य के खिलाफ विधानसभा अध्यक्ष उस राजनीतिक दल की शिकायत के आधार पर तुरंत कार्यवाही कर सकते हंै। वहीं, जब कोई विधायक सदन के बाहर त्यागपत्र देता है तब ऐसे मामलों में विधानसभाध्यक्ष का अधिकार सीमित होता है। विधायक के त्यागपत्र की स्वीकृति को लेकर जो नियम तय किए हैं उसमें यह देखना होता है क्या त्यागपत्र देनेवाले विधायक ने नियमों का उल्लंघन किया है? स्व-प्रह्यरित त्यागपत्र को स्वीकृत करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है।

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