बंडीपुर फिर गुलजार: सफारी शुरू, पहुंचने लगे पर्यटक

बंडीपुर राष्ट्रीय उद्यान में लगी भीषण आग के बाद से बंद की गई पार्क सफारी फिर से शुरू हो गई है। पिछले 23 फरवरी से ही ये सेवाएं बंद कर दी गई थीं। इस दावानल में लगभग 15 हजार एकड़ वनक्षेत्र जलकर खाक होने का अनुमान है।

By: शंकर शर्मा

Published: 03 Mar 2019, 11:58 PM IST

बेंगलूरु. बंडीपुर राष्ट्रीय उद्यान में लगी भीषण आग के बाद से बंद की गई पार्क सफारी फिर से शुरू हो गई है। पिछले 23 फरवरी से ही ये सेवाएं बंद कर दी गई थीं। इस दावानल में लगभग 15 हजार एकड़ वनक्षेत्र जलकर खाक होने का अनुमान है।

बंडीपुर टाइगर रिजर्व के निदेशक टी. बालचंद्र की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि सफारी सेवाएं शुरू होने के साथ ही पर्यटकों की आवाजाही अब सामान्य हो गई है। बाघ और तेंदुए नजर आने लगे हैं। वहीं हिरण, जंगली भैंसे, गौर और अन्य जानवर भी देखे गए। पूरे वनक्षेत्र में आग पूरी तरह बुझा दी गई है और स्थिति सामान्य होने लगी है। इस बीच वन अधिकारियों की बैठक में बालचंद्र ने कर्मचारियों को निर्देश दिया कि वन के संरक्षण के लिए पूरी तरह मुस्तैद रहें।

अभी गर्मियों की शुरुआत हुई है और कम से कम 70 दिनों तक चुनौती बनी रहेगी। उन्होंने कहा कि ग्रीष्म ऋतु के 35 दिन गुजर चुके हैं, जबकि 70 दिन बाकी हैं। किसी भी तरह की घटना को रोकने के लिए कर्मचारियों को पैनी नजर रखनी होगी। इसके साथ ही आसपास के गांवों के लोगों का भी सहयोग लेना होगा।


पांच साल में 36 हजार एकड़ वन क्षेत्र खाक
दरअसल, गर्मियों में बंडीपुर सहित अन्य वन क्षेत्रों को आगजनी की घटनाओं से बचाना एक बड़ी चुनौती रही है। पिछले पांच वर्षों के दौरान राज्य में लगभग 36 हजार एकड़ (35 हजार 891) वनक्षेत्र जलकर खाक हो गए। गर्मियों की शुरुआत होते ही बंडीपुर में अकेले 15 हजार एकड़ वनक्षेत्र राख बन गए। राज्य के सबसे अधिक प्रभावित जिले हैं-बेलगावी, चामराजनगर, मैसूरु, कोड़ुगू, दक्षिण कन्नड़, उत्तर कन्नड़ और शिवमोग्गा।

प्राकृतिक नहीं है आग
एक वन अधिकारी ने कहा कि राज्य के जंगलों में लगने वाली आग प्राकृतिक नहीं है। यह दुर्भावना से ग्रसित लोगों द्वारा लगाई गई आग है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस पर प्रभावी नियंत्रण के लिए स्थानीय लोगों, ग्रामीणों, आदिवासियों और वनकर्मियों की एक टीम बनानी चाहिए। इस साल अभी तक जंगल में लगी आग की 985 घटनाओं में 17 हजार 297 एकड़ जंगल जल चुके हैं। इससे पहले 2017-18 में 925 घटनाओं में 17 हजार 240 एकड़ जंगल जले थे।

हालांकि, इनमें से ज्यादातर आग जमीन पर लगती है, जिससे पेड़ों के निचले हिस्से या झाडिय़ां ज्यादा प्रभावित होती हैं। ये बारिश के साथ सामान्य तो हो जाते हैं, लेकिन इससे वहां की मिट्टी पर बेहद नकारात्मक असर पड़ रहा है। जंगलों में ऐसी आग नहीं लगती, जिनमें पेड़ के ऊपरी हिस्से को नुकसान हो।

शंकर शर्मा
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