खगोलीय घटना: पल्सर तारे से होगी ‘आतिशबाजी’

सूर्य से लगभग 10 हजार गुणा अधिक चमकीला और 15 गुणा अधिक भारी एक तारे के वातावरण से होकर उसका युग्मक पल्सर तारा यानी न्यूट्रॉन तारा गुजरने वाला है

By: शंकर शर्मा

Published: 09 Dec 2017, 09:41 AM IST

बेंगलूरु. सूर्य से लगभग 10 हजार गुणा अधिक चमकीला और 15 गुणा अधिक भारी एक तारे के वातावरण से होकर उसका युग्मक पल्सर तारा यानी न्यूट्रॉन तारा गुजरने वाला है। यह घटना वर्ष 2018 के शुरू में ही घटेगी जिससे रेडियो तरंगों और गामा किरणों का उत्सर्जन आतिशबाजी की तरह होने की संभावना है।


भारतीय ताराभौतिकी संस्थान के प्रोफेसर (सेनि) रमेश कपूर ने बताया कि पल्सर अथवा न्यूट्रॉन तारे एकल या किसी युग्म तारे के घटक हो सकते हैं। ऐसे ही एक पल्सर तारे जे-2032 प्लस 4127 (संक्षेप में जे-2032) की खोज हाल ही में हुई है।


यह एक युग्म तारे का घटक है। यह अपनी अक्ष में एक सेकेंड में 7 बार घूम जाता है। यह गामा किरणों और रेडियो तरंगों का एक बड़ा स्रोत है। इस पल्सर तारे की खोज 2009 में हुई जबकि दूसरे तारे की प्रकृति का पता तब चला जब वैज्ञानिकों ने जे-2032 के स्थान पर एक गर्म तारे एमटी 91213 को पाया, जो सिग्नस तारा समूह में था। आश्चर्य की बात है कि इस पल्सर की कक्षा अन्य ऐसे युग्मों के मुकाबले बहुत ही चपटी है। इसका एक अर्थ यह है कि यह युग्म अन्यों के मुकाबले युवा है।


यह पल्सर शायद 1 लाख 80 हजार वर्ष पहले सुपरनोवा विस्फोट में बना होगा। कक्षा चपटी होने के मतलब यह है कि पल्सर की मुख्य तारे से दूरी काफी घटती-बढ़ती है।


यह युग्म 5 हजार प्रकाश वर्ष दूर
इस न्यूट्रॉन तारे का परिभ्रमण काल 20 से 30 वर्ष आंका गया है और खोज के बाद यह पहली बार अपनी कक्षा में निकटतम बिंदु से होकर गुजरने वाला है। यह मौका वर्ष 2018 के शुरू में ही आएगा।


मुख्य तारा सूर्य से 10 हजार गुणा चमकीला और 15 गुणा भारी है। इस तारे के चारों ओर गैस और धूल का मंडलक (डिस्क) है और बाहरी वातावरण फैलता जा रहा है। इसी फैलते गर्म वातावरण और ***** से होकर यह पल्सर अगले कुछ महीनों में गुजरेगा। यह युग्म 5 हजार प्रकाश वर्ष दूर है और हमारी आकाशगंगा में ही है।

मुख्य तारे के वातावरण से गुजरते समय इस पल्सर की रेडियो तरंगें शायद हम तक ना पहुंचे परंतु गामा किरणें इस वातावरण से गुजरकर क्या विशिष्ट लक्षण दिखाएंगी इसका पता अंतरिक्ष में स्थापित नासा के फर्मी गामा-रे टेलीस्कोप के जरिए पता चलेगा।


छोटी दूरबीन या आंख से कोई हलचल नजर नहीं आएगी। पर कुछ अनोखा अवश्य होगा। दोनों तारों की प्रकृति गहराई से जानने का यह एक बेहतरीन मौका होगा।

चुंबकीय क्षेत्र : पृथ्वी से 1 हजार अरब गुणा अधिक शक्तिशाली
प्रो. कपूर ने बताया कि पल्सर अथवा न्यूट्रान तारे सूर्य से कई गुणा अधिक भारी तारों के सुपरनोवा विस्फोट में बनते हैं। सूर्य से कई गुणा अधिक भारी होने के बावजूद इनका आकार किसी मध्यम शहर के बराबर अर्थात लगभग 20 किमी ही होगा परंतु इनका चुंबकीय क्षेत्र पृथ्वी के मुकाबले 1 हजार अरब गुणा अधिक शक्तिशाली होता है।

इनके धु्रवीय क्षेत्र से ही गतिशील आवेशित कणों की पेंचीदा प्रक्रियाओं में शक्तिशाली विकिरण पैदा होता है जो गामा किरणों से लेकर रेडियो तंरगों तक फैला है। यह विकिरण किसी प्रकाश स्तंभ की बीम के रूप में निकलता है। जब ये बीम पृथ्वी की ओर उन्मुख होती है तो हमें एक स्पंद के रूप में विकिरण मिलता है। पल्सर का अपने अक्ष पर भ्रमण काल बहुत कम अवधि का है। यह एक सेकेंड या इससे भी कम हो सकता है। पहले पल्सर की खोज 1967 में हुई और इन 50 सालों में पदार्थ की सीमांत अवस्था के बारे में काफी जानकारी मिली।

शंकर शर्मा
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