धार्मिक संस्कार शिविर का समापन

धार्मिक संस्कार शिविर का समापन

Shankar Sharma | Updated: 04 Jun 2019, 11:12:45 PM (IST) Bangalore, Bangalore, Karnataka, India

श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन युवक मंडल एवं श्री जैन रत्न युवक परिषद बीजापुर के संयुक्त तत्वावधान में 10 दिवसीय धार्मिक संस्कार शिविर का जैन स्थानक बीजापुर में समापन समारोह आयोजित किया गया।

विजयपुर. श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन युवक मंडल एवं श्री जैन रत्न युवक परिषद बीजापुर के संयुक्त तत्वावधान में 10 दिवसीय धार्मिक संस्कार शिविर का जैन स्थानक बीजापुर में समापन समारोह आयोजित किया गया। शिविर में बच्चों को नैतिक एवं धार्मिक शिक्षा, प्रतिलेखन, गोचरी विवेक पर विशेष जानकारी दी गई। शिविर में दस दिन तक अनेक धार्मिक प्रतियोगिताओं का आयोजन हुआ।

कार्यक्रम के अंतिम दिन सभी शिविरार्थियों की परीक्षा आयोजित की गई। समापन समारोह में मुख्य अतिथि संघ के उपाध्यक्ष मणिकांत भाई शाह ने बच्चों से कहा कि वे इसी तरह धार्मिक शिक्षा में आगे बढ़ें और संघ हमेशा ऐसे शिविर का आयोजन करता रहेगा। सभी को ऐसे शिविरों का लाभ लेना चाहिए।


समारोह में संघ के वरिष्ठ श्रावक शांतिलाल बोथरा, युवा रत्न अशोक रुणवाल, श्राविका शकुंतला छाजेड़, समता रुणवाल, कविता शाह, हेमलताजी पीपाड़ा, सुनीत रुणवाल, हिनाबेन शाह, मोनिकजी लुंकड़, ज्योति रुणवाल, स्मिता रुणवाल ने भी विचार रखे। सभी शिविरार्थियों को अखिल भारतीय जैन रत्न युवक परिषद एवं स्थानीय जैन युवक मंडल की ओर से पुरस्कृत किया गया।

कार्यक्रम का संचालन अखिल भारतीय श्री जैन रत्न युवक परिषद कर्नाटक के क्षेत्रीय प्रधान विजय नितिन रुणवाल एवं नीरज बोथरा ने किया। युवक परिषद बीजापुर के अध्यक्ष आनंदजी रुणवाल, रिकब रुणवाल, ऋषभ रुणवाल, यश रुणवाल, दीपक रुणवाल, श्रीपाल रुणवाल एवं युवक मंडल के सभी सदस्यों ने पूर्ण सहयोग दिया।

अर्थ और काम पुरुषार्थ आत्मा के विकार रूप
हुब्बल्ली. आचार्य महेन्द्र सागर सूरि ने कहा कि भारत देश पुरुषार्थ को मानता है पर उसका पुरुषार्थ धर्म प्रधान है। अर्थ और काम पुरुषार्थ आत्मा के विकार रूप हैं, जबकि धर्म और मोक्ष आत्मा का स्वाभाविक पुरुषार्थ है। वहीं, धर्म और मोक्ष आत्मा का स्वाभाविक पुरुषार्थ है।


उन्होंने कहा कि मनुष्य का साध्य मोक्ष है। उसकी सिद्धि धर्म से होती है। सिद्धि न हो, वहां तक अर्थ काम पुरुषार्थ की जरूरत भी रहती है, वो मिले भी तो जितना धर्म पुरुषार्थ अच्छा करेंगे उतना ही अच्छा फल मिलेगा।


आचार्य ने कहा कि आज के समय में मां-बाप संतानों की शिकायतें करते रहते हैं और कहते हैं कि ये हमारी मानते नहीं हैं, जो हमें पसन्द है उसके विपरीत ही चलते हैं। ऐसी फरियाद करने वाले मां-बाप से कहना चाहता हूं कि आप लडक़े से कह दें कि वह जब तक धर्म समझकर हमारी बात नहीं मानेंगे तब तक वे उसे पीठ पर बैठाएंगे और उसी की कमाई खाएंगे और इसी तरह लडक़ी से भी कह दें कि वह धर्म समझकर ही हमारी बातों का अनुशरण करेगी, नहीं तो उसे किसी दूसरे परिवार को बिगाडऩे के लिए बहू बनाकर नहीं भेजा जाएगा। उन्होंने कहा कि भारतवर्ष की धर्म प्रधान पवित्र आर्य संस्कृति इसीलिए संपूर्ण जगत को विश्वशांति एवं प्रेरणा का उपदेश देती है।

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