विश्व अंतरिक्ष सप्ताह का समापन

विश्व अंतरिक्ष सप्ताह का समापन

Shankar Sharma | Publish: Oct, 14 2018 12:25:08 AM (IST) Bangalore, Karnataka, India

शहर के बी.आई.टी.एम. कॉलेज में जे.एस.डब्ल्यू. भारतीय रेडक्रॉस संस्थान के सहयोग से आयोजित विश्व अंतरिक्ष सप्ताह का समापन समारोहपूर्वक हुआ।

बल्लारी. शहर के बी.आई.टी.एम. कॉलेज में जे.एस.डब्ल्यू. भारतीय रेडक्रॉस संस्थान के सहयोग से आयोजित विश्व अंतरिक्ष सप्ताह का समापन समारोहपूर्वक हुआ। श्रीहरिकोटा के सतीश धवन, स्पेस सेंटर वी.ए.एल.एफ. विभाग के प्रबंधक वी. नागराजु ने अंतरिक्ष यान प्रौद्योगिकी क्षेत्र को सरकार की ओर से अतिरिक्त अनुदान मुहैया करवाए जाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि विश्व के अन्य अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्रों की तुलना में एक प्रतिशत से भी कम अनुदान प्राप्त करने वाले इसरो संस्थान ने कई वैज्ञानिक चमत्कार किए हैं। अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी से संबंधित जागरूकता फैलाने के लिए शीघ्र ही टी.वी. चैनल की सेवा शुरू की जाएगी।


आई.टी.एम. कॉलेज के प्राचार्य डॉ. वी.सी. पाटील ने कहा कि वर्ष २०२० तक उनके कॉलेज के विद्यार्थी ही उपग्रह का निर्माण करेंगे। सप्ताह के प्रमुख प्रबंधक जे. गोपालकृष्णन, नोडल अधिकारी एम.ए. शकीब, कॉलेज के उपनिदेशक प्रो. पृथ्वीराज, बी.आई.टी.एम. अध्यक्ष एस.जी.वी. महिपाल सहित अनेक गणमान्यों ने विचार व्यक्त किए। सप्ताह के उपलक्ष्य में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी से संबंधित बेहतरीन मॉडल प्रदर्शित करने वाले विद्यार्थियों को पुरस्कृत किया गया।


नाटक समाज का दर्पण है
इलकल. बेलगावी जिले में घटित घटना पर रचित नाटक पल्लक्की पुट्टव्वा का गुरुवार शाम शानदार मंचन हुआ। इस अवसर पर हुच्चेश्वरमठ, कमतगी के मठाधीश होलेहुच्चेश्वर महास्वामी ने कहा कि नाटक समाज का दर्पण है। पात्रों का सजीव और प्रभावशाली चरित्र ही नाटक की जान होता है। नाटक मंचन के समय कलाकार और दर्शक दोनों आमने-सामने होते हैं। रंगमंच पर किसी प्रकार का रिटेक नहीं होता, इसलिए कलाकारों को कड़ी मेहनत करनी पड़ती हैं।


उन्होंने कहा कि नाट्यकला प्राचीन समय से चली आ रही है। यह कला शाश्वत है। आज लुप्त होने के कगार पर खड़े रंगमंच को बचाना हमारा कर्तव्य है। दर्शकों को समय निकाल कर नाटकों को जरूर देखना चाहिए। नाटकों से हमें अनेक संदेश मिलते हैं। महास्वामी ने कहा कि सिनेमा एवं टीवी की चकाचौंध ने नाटकों की चमक को थोड़ा फीका कर दिया था। इससे थोड़े समय के लिए नाटकों पर गहरा संकट भी छाया। इससे नाटक देखने वाले दर्शकों की संख्या में कमी आ गई थी, परन्तु समय के साथ नाटकों में भी तकनीक बदलाव आया और फिर से नाटक देखने वाले दर्शकों की संख्या में बढोतरी हो रही हैं। जो भी कलाकार रंगमंच में कदम रखता है, रंगमंच उसकी रगों में बस जाता है।

कलाकार कभी रंगमंच से दूर नहीं हो सकता। विजय महांतेश संस्थानमठ के मठाधीश गुरूमहांतस्वामी ने अपने संबोधन में यह कहा कि इलकल शहर कलाकारों का मायका है। यहां के अनेक कलाकारों ने रंगमंच मेंं नाम व शौहरत पाई है। यहां के लोग सदैव कला की कद्र करते हुए प्रोत्साहित करते हैं। उन्होंने कलाकारों को नसीहत देते हुए कहा कि नाटक की कथावस्तु ऐसी होनी चाहिए कि परिवार के सारे सदस्य साथ में बैठकर नाटक को देख सके। किसी भी प्रकार का व्यसन बुरी बला है इसलिए उस बला से दूर रहना चाहिए। मंच पर महांततीर्थ, शिरूर के मठाधीश बसवलिंग महास्वामी उपस्थित थे। वचन प्रार्थना नागराज बसूदे ने प्रस्तुत की। रंगगीत विधाश्री गन्जी ने गाया। स्वागत व्यवस्थापक फियाज बीजापुर ने किया। संचालन मुत्तुराज दंडीन ने किया।

गुरूलिंगय्यास्वामी हिरेमठ ने आभार जताया। पल्लक्की पुट्टव्वा नाटक का पहला प्रदर्शन काफी प्रभावित करने वाला रहा। पल्लक्की पुट्टव्वा के किरदार को कलाकार ज्योति मेंगलूर ने जीवित कर दिया। उनकी अदाकारी ने दर्शकों को तीन घंटे तक बांधे रखा। उनके पिता साहूकार बेट्टप्पा की भूमिका में भरतराज तालीकोटी, उनके खास मित्र कादर का किरदार निभाने वाले कलाकार की अदाकारी लाजवाब थी।

बीच-बीच में अपनी अद्भुत अदाकारी से दशकों को गुदगुदाने वाले बूढ़ा पति एवं जवान पत्नी का पात्र निभाने वाले एवं देसी वैद्य तथा उसके साथी ने अपने पात्रों को बखूबी निभाया। नाटक दर्शकों का मनोरंजन करने मेंं सफल रहा।

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