स्कूटर पर 71 वर्षीय मां के साथ पूरा किया 56 हजार किलोमीटर का सफर

  • ‘आधुनिक श्रवण कुमार’ की यह बात आपकी आंखें नम कर देगी
  • न कोरोना की परवाह, न लॉकडाउन की चिंता

By: Santosh kumar Pandey

Published: 24 May 2020, 09:21 PM IST

बेंगलूरु. आप चाहें तो दक्षिणमूर्ति कृष्णकुमार को ‘आधुनिक श्रवण कुमार’ कह सकते हैं। कृष्णकुमार ने कुछ ऐसा कर दिखाया है जिसकी मिसाल दुर्लभ है। मां की सेवा के लिए यदि कोई अविवाहित रह जाए और मां की इच्छा पूरी करने को ही जीवन समर्पित कर दे तो उसे और क्या कहेंगे।

मैसूरु निवासी 41 वर्षीय कृष्णकुमार से उनकी मां ने जब धार्मिक स्थलों की यात्रा करने की इच्छा जाहिर की तो उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी। मां को धार्मिक स्थलों की यात्रा करवाने का संकल्प लिया और स्कूटर पर निकल पड़े। स्कूटर 20 साल पुराना था और मां की उम्र 71 साल, लेकिन कृष्णकुमार का जुनून ऐसा था कि हर बाधा परास्त होती गई। न कोरोना की परवाह, न लॉकडाउन की चिंता, मां का साथ और सफर जारी रहा।

जाग उठे तो चल दिए और थक गए तो सो लिए जैसी सहजता से वे आगे बढ़ते रहे। बदलता मौसम, पथरीले रास्ते, अलग तरह का खानपान, बोली-भाषा की समस्या सब कुछ पीछे छूटता रहा। देश के सैकड़ों मंदिरों में पूजा-अर्चना के बाद नेपाल और म्यामार, भूटान तक जा पहुंचे। इसी बीच दो साल का समय बीत चुका था।

ऐसे में उन्हें अपनी माटी, अपने घर की याद आई और वे लौट आए। 56,027 किलोमीटर के सफर के बाद जब कर्नाटक की सीमा में पहुंचे तो आखें भर आईं और हृदय गद्गद् हो गया। मधुगिरी तालुक स्थित रामकृष्ण आश्रम में पहुंचे कृष्णकुमार फिहाल कुछ समय यहीं पर बिताना चाहते हैं।

बदल गया जीवन
लगभग 27 महीने की इस यात्रा ने कृष्णकुमार के जीवन को अध्यात्म से भर दिया है। वे कहते हैं, इस यात्रा ने मेरे जीवन को ढेर सारे अनुभव दिए हैं। हम लोग कभी भूखे नहीं सोए, कहीं कोई समस्या नहीं आई। लोगों ने आगे बढक़र मदद की। इतना प्यार मिला कि क्या कहूं। अब जीवन का हर पल अध्यात्म को समर्पित रहेगा।

मां ने कहा, मैं खुशनसीब
वहीं, मां चूडारत्ना को बेटे पर गर्व है। वे कहती हैं, मेरी जिंदगी एक छोटे से कमरे में कैद थी। बेटे ने मुझे इतने सारे मंदिरों के दर्शन करवाए, दुनिया दिखाई। मैं खुशनसीब हूं कि ऐसे पुत्र को जन्म दिया है।

‘मातृसेवा संकल्प यात्रा ’

कृष्णकुमार ने जनवरी, 2018 में ‘मातृसेवा संकल्प यात्रा ’ शुरू की थी। कर्नाटक के सारे मंदिरों में पूजा-अर्चना के बाद वे देश के अधिकांश मंदिरों तक पहुंचे। और फिर उसके बाद यह सफर बढ़ता गया। एक और बेहद दिलचस्प बात, कृष्णकुमार का स्कूटर उनके पिता की निशानी है और वे उसमें पिता की आध्यात्मिक उपस्थिति का एहसास करते हैं। वे कहते हैं, इतनी लम्बी यात्रा के दौरान पंचर होने के अलावा स्कूटर कभी नहीं बिगड़ा, क्योंकि इस यात्रा में मेरे पिता भी साथ थे।

Santosh kumar Pandey Desk
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