कोरोना ने बदला जायका, अब घर के पकवान लग रहे लजीज

बच्चे अब पिज्जा बर्गर नहीं मेंगो शेक मांग रहे

By: Yogesh Sharma

Published: 28 May 2020, 07:47 PM IST

बेंगलूरु. कोरोना के चलते देश भर में लगाई गई तालाबंदी ने बड़े बुजुर्गों को भी सम्मान दिलाया है। लोगों का होटलों में जाना कम हुआ है। वहीं घर में बने पकवानों की महक अभी तक रसाई में बरकरार है। बच्चों से लेकर बुजुर्ग सभी घर के खाने को बड़े चाव से खा रहे हैं। पिज्जा बर्गर खाने वाले बच्चों को घर में बने पकवान व व्यंजन बहुत भा रहे हैं।
संजयनगर निवासी मन्जू जैन का कहना है कि वे लॉकडाउन से पहले दिसम्बर में ही राजस्थान से बेंगलूरु आ गई थीं। दोनों पुत्र यहीं व्यवसाय में हंै। बड़ी बहू के डिलेवरी ड्यू थी। जनवरी में बीच पौत्र प्राप्ति हुई। लाक डाउन क्या हुआ, मानो दादी-दादा के लिए मजे से समय बिताने का जरिया मिल गया। वही नवजात पौत्र की तो लाटरी लग गई। उसे खिलाने के लिए परिवार में सभी बड़ों का खूब लाड़ मिला। वे कहती हैं कि किसी भी परिवार में न्यू बोर्न को एक साथ इतना समय कभी भी नहीं मिल सकता। लॉक डाउन का असर मन्जू देवी जीवनभर नहीं भूल सकंेगी। वे ईश्वर का शुक्रिया अदा करती हैं कि अच्छा हुआ पति के साथ बेंगलूरु आ गई। पोता उनके जीवन में खुशियां लेकर आया। लॉकडाउन में परिवार के साथ मिलकर कुछ देसी खाद्य सामग्री भी बना ली।
हनुमंतनगर निवासी श्रीकांता दाधीच का कहना है कि लॉकडाउन के दौरान मेरी बेटी गुंजन को नए-नए पकवान और व्यंजन बनाना सिखाया। सासु मां की सेवा की। मेरी पति जो समाज सेवा में लगे थे। उन्हें समय से चाय नाश्ता कराने के बाद घर से जाने दिया। पति ने करीब ५० दिन तक पुलिस व प्रशासन के लिए एक ग्रुप के साथ मिलकर समाज सेवा की। कॉलोनी के सभी मंदिर बन्द होने के कारण घर में ही प्रतिदिन परिवार सहित पू्रजा अर्चना कर धर्म कर्म में रुचि ली। घर को ही मंदिर बनाने का पूरा प्रयास किया। जब भी फ्री समय मिला अपने बच्चों व पति के साथ इन्डोर गेम कैरम व शतरंज खेलकर मनोरंजन किया। परिवार के अधिकांश सदस्य राजस्थान रहते हैं, वीडियो कॉलिंग कर प्रतिदिन उनके हाल जाने। इस दौरान कम खर्च में घर चलाने का भी एक अच्छा अनुभव हुआ।
बनरघट्टा रोड निवासी निशा जैन का कहना है कि मध्यमवर्गीय परिवार की वे महिलाएं जो घर और बाहर दोनों संभालती हैं। मतलब बाहर काम करने भी जाती हैं और घर भी अपने आप ही संवारती हैं। एसे में उन्हें अपने लिए पूर्ण समय नहीं मिलता था। मैं भी उनमें से एक महिला हूं जिसे अपने लिए समय निकालना कभी संभव प्रतीत नहीं हुआ। मैं एक अध्यापिका हूं। घर, स्कूल और परिवार की जिम्मेदारी में अपना ध्यान कभी रखा ही नहीं। लॉकडाउन से एक सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि मुझे अपने परिवार, अपने पति और बच्चों के साथ-साथ अपने पर ध्यान देने का समय भी मिला या यूं कहूं कि अपने लिए भी मैं समय निकाल पाई। जिसने मुझे मेरे अंदर छिपी प्रतिभा से रुबरू भी कराया। मैंने कुछ कविताएं भी लिखीं। इस तरह से मेरा समय बहुत ही अच्छा व्यतीत हुआ।
बसवनगुड़ी निवासी संगीता गुलेच्छा ने कहा कि लॉकडाउन का प्रथम चरण हमारे लिए दर्द भरा रहा क्योंकि लाकडाउन घोषित होने के 4 दिन पहले हमारी सासू मां का निधन हो गया था। हम उनके निमित कुछ भी कार्यक्रम नहीं रख सके। एक अदृश्य शक्ति कोरोना का प्रकोप ऐसा था कि हर कोई अपने घर-परिवार में सिमट कर रह गया। मेरी बहू पिंकी और मैं सारे घर की सुख सुविधाओं का पूरा ख्याल रखने लगे थे, किसी सामान की अति आवश्कता होने पर ही मुंह पर मास्क एवं सैनेटाइजर साथ में लेकर निकलती थी। खाली समय परिवार के साथ बिताया। हमारे किटी एवं परिवार के व्हाट्सअप्प ग्रुप में रोज अनेक तरह की प्रतियोगिताएं होती थी जिसमे हमेशा भाग लेती रहती थी। सामाजिक सरोकार के डिबेट्स एवं भक्ति कार्यक्रम देखते-सुनते समय अच्छी तरह व्यतीत हुआ।
जेपीनगर निवासी संजूदेवी प्रजापत ने कहा कि लॉकडाउन में हमारे पूरे परिवार ने नई दिनचर्या की शुरुआत की। सुबह जल्दी उठकर पूजा पाठ करके सभी परिवार के सदस्यों ने धार्मिक कार्यक्रम रामायण महाभारत देखकर अपनी अतीत को याद किया। रामायण के बाद धर्म पर परिवार सहित चर्चाएं भी की। बाद में हर रोज कुछ नए व्यंजन बनाने की तैयारी एक दिन पहले से करते व कुछ जानकारी मेरे मायके मुम्बई व ससुराल सोजत सिटी विडियो कॉल करके हासिल करती थी। इस दौरान पूरे दिन माहौल खुशनुमा रहता। लॉकडाउन में हमने बार-बार हाथ धोने व सैनेटाइजर का इस्तेमाल कियाञ मैं ईश्वर से यही प्रार्थना करती हूं कि इस कोरोना महामारी का जल्दी खात्मा हो। जल्द से जल्द जीवन पटरी पर लौटे और सब कुछ पहले जैसा सामान्य हो ताकि सब खुशहाल रह सकें।
होंगसन्द्रा निवासी आरती राजपुरोहित ने कहा कि वह द्वितीय पीयू की छात्रा है। कोरोना के कारण मेरी एक परीक्षा बाकी रह गई हैं जिसकी तैयारी मैं कर चुकी हूं। लॉकडाउन के समय में मैंने अपनी मम्मी के साथ किचन में काफी मदद की और साथ ही कुछ अलग प्रकार के व्यंजन भी बनाने की कोशिश की। हमारे होंगसन्द्रा में कोरोना के 38 मरीज मिलने के कारण हमारा पूरा एरिया रेड जोन घोषित हो गया। इसी समय मेरा व मेरी बहन का जन्मदिन था और मेरे मम्मी पापा की शादी की सालगिराह भी थी। तो हमारा घर से निकलना भी बहुत मुश्किल था। तब मैंने घर में ही बिस्किट से विभिन्न प्रकार के केक बनाकर सबका जन्मदिन मनाया। आज मैं बढिय़ा से बढिय़ा केक बना सकती हूं। वीडियो कॉल से मैंने अपने परिवार के सभी सदस्यों को केक बनाने की विधि बताई।
हासन निवासी प्रेमलता जैन की मानें तो इस लॉकडाउन में बहुत सा समय जैन अध्यात्म , धर्म ध्यान में लगाया। संयुक्त परिवार होने कि वज़ह से कोई तकलीफ नहीं हुई। राजस्थान पत्रिका की कमी रही, जो बच्चों के बोलने के बाद राजस्थान ई पत्रिका मोबाइल पर हर रोज पढऩे लगी। दादी होने की वजह से घर में पोता- पोतियो के साथ समय गुजर जाता था। तेरापंथ धर्म संघ से जुड़े हर ऑनलाइन क्विज में भाग लिया। दोनों बहू जो इस समय मेरे साथ हैं भरपूर सेवा की, एक बहू राजस्थान में है। हर रोज फोन करके हालचाल पूछती हूं। आशा करती हूं कि जल्दी से जल्दी इस बीमारी कि दवाई मिले और सब कुछ सामान्य हो जाए, सभी डॉक्टर, पुलिस कर्मी, बैंक कर्मचारी, स्वयं सेवक को मेरी तरफ से साधुवाद। कोरोना काल में सैनेटाइजर एक जरूरत की वस्तु बन गया है।
कुमार पार्क निवासी कविता जैन का कहना है कि कई खट्टे मीठे अनुभव इस लॉकडाउन में मिले हैं। उन्होंने कहा कि बेशक लॉकडाउन के दौरान घर से बाहर जाना बंद था, कामवाली बाई का अभी आना बंद था। मंदिर भी बंद थे। इसके बावजूद हमने अपने घर में समय का सदुपयोग किया। उन्होंने कहा कि मेरे दो बेटियां और एक बेटा है। मेरी बड़ी बेटी जो 20 साल की है उसके साथ काफी समय अच्छा बीता। दोस्तों में मशगूल रहने वाली मेरी बेटी इस समय मुझे अपना अच्छा दोस्त मानने लगी है। वह अपनी काफी बातें मुझसे से शेयर करने लगी है तथा नई-नई डिश बनाकर सबको खिलाने लगी है। कामवाली का आना बंद होते ही मेरे बच्चों ने घर का काम अपने आप बांट लिया। पति के साथ भी अच्छा वक्त बीत रहा है। शतरंज, चौपड़, ताश तथा कैरम भी बाहर आ गए हैं।
बसवेश्वर नगर निवासी सरिता हीरावत का कहना है कि कोरोना का कहर तो अब भी जारी है। कोरोना ने हमें एक अच्छी सीख दी है। इसके चलते जो लॉकडाउन हुआ है। उसने दूरियों को नजदीकी में बदल दिया है। जैसे परिवार में एक साथ रहना, खेलना, खाना। एक साथ बैठकर धार्मिक अनुष्ठान करना। सचमुच परिवार में बुजुर्गों के साथ रहने में जो आनंद की अनुभूति होती है वह तो देखते ही बनती है। जन्मदिन और विवाह वर्षगांठ हमेशा होटल तक ही सीमित हुआ करती थी। इस बार यह खास दिन घर में एक साथ अलग रंग और ढंग से मनाए गए। लॉकडाउन ने मुझे काफी हद तक क्रिएटिव बनाया है तथा बचपन की यादें ताजा कर दी, जैसे गट्टा खेलना लूडो आदि। छोटी-मोटी सिलाई करके पति और बच्चों को भी घरेलू काम सीखने का मौका मिला है।
मंजूनाथ नगर, राजाजीनगर निवासी अनिता परमार ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान परिवार सहित घर पर रहे। परिवार के सदस्यों की इच्छा अनुसार तरह-तरह के व्यंजन यू ट्यूब देख कर बनाए। पकवान बनाना सीखा। पहले हम होटल में ज्यादा रुपए देते थे वहीं आइटम कम कीमत में बनने लगा। परिवार के सभी सदस्यों ने मिलकर घर के कामों में हाथ बंटाया। समय निकालकर बच्चों के साथ नए-नए गेम खेले। कोरोना से बचने के लिए घर के सभी सदस्यों को गर्म पानी पिलाया। स्वदेशी नुस्खे अपनाए। रात को सोते समय गर्म दूध में हल्दी मिलाकर बच्चों को दी। रामायण और महाभारत धारावाहिक देखकर धर्म में अपनी रुचि बढ़ाई। गत वर्षों में की गई बचत से कोरोना काल के दौरान परिवार के सभी खर्चे बहुत आसानी से उठाए कम आय के बावजूद तकलीफ नहीं हुई।

Yogesh Sharma Reporting
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