कोविड-19 महामारी के बीच रक्त की कमी से जूझ रहे ब्लड बैंक

इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ में ढाई वर्षीय थैलेसीमिया पीडि़त बच्ची को ओ-पॉजिटिव रक्त की जरूरत पड़ी तो लायंस ब्लडलाइन के संपर्क करने पर पी. सोनी नामक एक महिला दाता 80 किलोमीटर दूर कुणीगेल से मंगलवार को अस्पताल पहुंची और रक्तदान किया। सोनी ने कहा मां होने के नाते बच्चों के दर्द का अहसास है।

By: Nikhil Kumar

Published: 07 Apr 2020, 11:36 PM IST

- रिप्लेसमेंट मिलना मुश्किल
- पुराने दाताओं पर निर्भरता अधिक

बेंगलूरु.

कोविड-19 महामारी (Covid - 19 Pandemic) के बीच अस्पताल से लेकर ब्लड बैंक रक्त की कमी से जूझ रहे हैं। संक्रमण के खतरों के कारण पहले की तूलना में रक्त दाताओं (Blood Donor) की सं या चिंताजनक रूप से घटी है। ब्लड कैंसर, ल्यूकेमिया, थैलेसीमिया व कैंसर (Blood Cancer, thalassemia, Leukemia) के मरीज मुश्किल में हैं। इस बीच ब्लड बैंकों (Blood Bank) ने रक्त दान को सुरक्षित बता कर लोगों से दान के लिए आगे आने की अपील की है। रक्त संग्रह करते समय सुरक्षा का ख्याल रखा जाता है।

हालांकि लोगों को ब्लड बैंक व अस्पताल पहुंचने में भी मुश्किलें आ रही हैं। ब्लड बैंक व अस्पताल पुराने रक्तदाताओं से लगातार संपर्क में हैं। इससे कुछ हद तक किल्लत से निपटने में मदद मिली है। ज्यादातर ब्लड बैंक आपात मामलों में ही रक्त उपलब्ध करा पा रहे हैं।

विक्टोरिया अस्पताल के ब्लड बैंक के तकनीशियन मोहन ने बताया कि पहले की तुलना में रक्त की कमी है। बाहर के बैंकों से भी इंतजाम करने में मुश्किलें आ रही हैं। ट्रॉमा केंद्र के डॉ. शिवकुमार ने बताया कि लॉकडाउन के कारण सड़क दुर्घटनाएं नहीं हो रही हैं। इसलिए रक्त की मांग में कमी आई है। ऐसे में रक्त अन्य मरीजों के काम आ रहा है।

400 थैलेसीमिया मरीजों को चाहिए रक्त
संत जॉन मेडिकल कॉलेज एंड अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक संजय लेनिन ने बताया कि अस्पताल में करीब 400 थैलेसीमिया मरीजों को उपचार होता है। इनका नियमित रक्त ट्रांसफ्यूजन प्रभावित हुआ है। ट्रॉमा मरीजों के लिए भी पर्याप्त मात्रा में रक्त उपलब्ध नहीं है। नियमित रक्त दान कैंप का आयोजन नहीं हो पा रहा है। दाताओं की संख्या में ४० फीसदी तक की कमी आई है। संपर्क करने पर पुराने रक्तदाता मदद के लिए सामने आते हैं।

मणिपाल अस्पताल चिकित्सा सेवा के प्रमुख डॉ. अनूप अमरनाथ ने बताया कि ब्लड बैंकों द्वारा अधिकृत दाताओं को पुलिस कफ्र्यू पास दे रही है। फिलहाल अस्पताल रक्त के लिए मरीजों के परिजनों व दोस्तों पर निर्भर है। निकट भविष्य में विकट स्थित पैदा होने की संभावना है।

इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी ब्लड बैंक के महासचिव प्रशांत चंद्रशेखर ने बताया कि आम तौर पर जनवरी और मार्च के बीच चार हजार यूनिट तक रक्त संग्रह करते आ रहे हैं। संकल्प इंडिया फाउंडेशन के अनुसार आईटी पेशेवर बड़ी संख्या में रक्तदान करते हैं। लेकिन फिलहाल ये कोविड-19 से परेशान हैं। ज्यादातर कर्मचारी घर से काम कर रहे हैं। कंपनियों में भी रक्तदान शिविर को आयोजन नहीं हो पा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि आवासीय इलाकों व अपार्टमेंट्स मालिकों से बात कर लोगों को रक्त दान के लिए राजी करने की कोशिश की जा सकती है। एक बार में दो-तीन लोग आ सकते हैं। बशर्ते ब्लड बैंक व अस्पताल उनका परिवहन सुनिश्चित करें।

तीन दशक में पहली बार इतनी किल्लत
बेंगलूरु चिकित्सा सेवा ट्रस्ट के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. नरसिम्हा स्वामी ने बताया कि शहर में 24 रक्त संग्रह केंद्र हैं। जहां से सरकारी व निजी अस्पतालों को रक्त की आपूर्ति होती है लेकिन रक्त की कमी है। हर किसी को रक्त उपलब्ध करा पाना संभव नहीं है। हर माह करीब तीन हजार यूनिट रक्त संग्रह करते थे। लेकिन लॉकडाउन के बाद यह संख्या करीब 500 तक गिरी है। गत तीन दशक में पहली बार रक्त की इतनी बड़ी किल्लत से जूझना पड़ रहा है। थैलेसीमिया मरीजों के मामले में परिजनों को रिप्लेसमेंट दाता लाने के लिए कहते हैं। दूसरा विकल्प नहीं है।

मां होने के नाते बच्चों के दर्द का अहसास है

लायंस ब्लडलाइन के अल्फोंसे कुरियन कामिचेरिल ने बताया कि कोरोना वायरस को लेकर लोग चिंतित जरूरत हैं। कुछ लोग दान के लिए आगे आ रहे हैं तो कई पारिवारिक दबाव के कारण पीछे हट जा रहे हैं। इनके बीच कुछ ऐसे लोग भी हैं जो किसी भी सूरत में रक्तदान को धर्म मानते हैं। कुरियन ने बताया कि इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ में ढाई वर्षीय थैलेसीमिया पीडि़त बच्ची को ओ-पॉजिटिव रक्त की जरूरत पड़ी तो लायंस ब्लडलाइन के संपर्क करने पर पी. सोनी नामक एक महिला दाता 80 किलोमीटर दूर कुणीगेल से मंगलवार को अस्पताल पहुंची और रक्तदान किया। सोनी ने कहा मां होने के नाते बच्चों के दर्द का अहसास है।

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Nikhil Kumar Reporting
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