जनसेवा से स्वार्थ और परमार्थ दोनो की साधना-देवेंद्रसागर

धर्म चर्चा

By: Yogesh Sharma

Published: 10 Sep 2020, 07:46 PM IST

बेंगलूरु. राजाजीनगर के सलोत जैन आराधना भवन में आचार्य देवेंद्रसागर सूरी ने कहा कि सेवा, परमार्थ भगवदीय पथ है। जहां जीवन सिद्धि है। भारतीय संस्कृति चिरकाल से ही पर्यावरण रक्षण मानवीय मूल्यों के संपोषण और अन्य के प्रति आत्मवत व्यवहार की पक्षधर रही है। सभी के प्रति एकात्मता और आदर का भाव रखें। सेवा के भावों को अंगीकार करते हुए समाज को अनुकरणीय दिशा दी जा सकती है। मानव समाज में हमेशा सेवाभाव होना अति आवश्यक है। इससे समाज के अंदर फैली कुरीतियां समाप्त होती हैं। सामान्य सेवा कार्यों को भी व्यक्ति यदि जीवन पर्यंत करता रहे तो उसका अहं भाव पूरी तरह समाप्त होकर उसके लिए आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त कर देगा। एक-दूसरे के प्रति प्रेमभाव से सामाजिक एकता, शांति और भाईचारे का आधार बनता है। उन्होंने कहा कि इतना ही नहीं सेवा कार्यों से उत्तम जीवन मूल्यों की स्थापना होती है। हमें मानवता को भूलना नहीं चाहिए। मानव समाज में सबसे कमजोर, दबे-कुचले, गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा ही सच्ची उपासना कहा गया है। वास्तव में सेवा भाव है, कर्म नहीं। इस कारण प्रत्येक परिस्थिति में योग्यता, रुचि और सामर्थ्य के अनुसार सेवा हो सकती है। सच्चे सेवक की दृष्टि में कोई भी पराया नहीं होता। नि:स्वार्थ भाव से सेवा करना मानव धर्म भी है। हमारे शास्त्रों में ऐसे अनेक प्रसंग हैं जो हमें सेवा परोपकार की महत्ता बताते हैं।
सेवा धर्म ही अध्यात्म का प्रतिफल है। परमार्थ पथ पर अग्रसर होने वाले को सेवा धर्म अपनाना होता है। जिसके हृदय में दया, करुणा, प्रेम और उदारता है, वही सच्चा अध्यात्मवादी है। इन सद्गुणों को जीवन क्रम में समाविष्ट करने के लिए सेवा धर्म अपनाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है। हमारे यहां दान का अत्यधिक महत्व है। छोटे-बड़े संकल्पों से लेकर देवदर्शन तक कोई काम दान के बिना आरंभ नहीं होता। दान पुण्य यह दोनों शब्द एक तरह से पर्यायवाची बन गए हैं। दान में ही पुण्य है, पुण्य तभी होगा जब दान किया जाए। यह मान्यता सैद्धांतिक रूप से ठीक है। आचार्य ने कहा कि एक बात और कही वह यह कि समाज में कार्य करते समय सुख-दुख, मान-अपमान, हानि-लाभ, क्रोध-द्वेष के अनेकों अवसर आएंगे। अनेकानेक कठिनाइयों और प्रतिकूल परिस्थितियों से होकर गुजरना होगा। इन अवसरों पर ही मनुष्य की परख होती है। मनोविकारों को जीत कर जैसे-जैसे मनुष्य जनसेवा की ओर बढ़ता है, वैसे ही वैसे समस्त समाज, राष्ट्र और विश्व उसका अपना परिवार बनता चला जाता है। इस प्रकार जनसेवा के मंगलमय मार्ग का अवलंबन करने से स्वार्थ और परमार्थ दोनों की साधना पूरी हो जाती है।

Yogesh Sharma Reporting
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