विधान परिषद भंग करने पर बहस

अन्य राज्यों की तरह कर्नाटक में भी विधान परिषद को भंग करने की मांग

By: Sanjay Kulkarni

Published: 18 Dec 2020, 08:17 AM IST

बेंगलूरु. हाल में विधान मंडल के उपरी सदन विधान परिषद में हुए घटनाक्रम के बाद अब राज्य में विधान परिषद को भंग करने की मांग को लेकर बहस छिड़ गई है। सदन में भाजपा, कांग्रेस तथा जनता दल-एस के बर्ताव पर राजनीतिक विश्लेषकों ने आक्रोश व्यक्त करते हुए परिषद की जरूरत पर ही सवालिया निशान लगा दिए हैं। कई अन्य राज्यों की तरह कर्नाटक में भी विधान परिषद को भंग करने की मांग की जा रही है।

राजनीतिक पुनर्वास केंद्र बनी परिषद

साहित्यकार बरगूरु रामचंद्रप्पा के मुताबिक विधान परिषद को वरिष्ठ जनों का सदन कहा जाता है।समाज में ऐसे कई लोग है जिनके लिए चुनाव जीतना संभव नहीं है ऐसे लोगों के तजुर्बे की प्रशासन को सहायता मिले इसलिए विधान परिषद का गठन किया गया था। लेकिन अब विधान परिषद महज एक राजनीतिक पुनर्वास केंद्र बन चुकी है। चुनाव में हारनेवालों को अब विधान परिषद का सदस्य बनाया जा रहा है। संगीत, कला, शिक्षा समाजसेवा जैसे कोटे से भी सक्रिय राजनेताओं का ही चयन हो रहा है। परिषद में अब केवल धनवानों की तूती बज रही है।

अब केवल छह राज्यों में बचा अस्तित्व

विधान परिषद के पूर्व सदस्य तथा पूर्व कानून एवं संसदीय मामलों के मंत्री एमसी नाणय्या के मुताबिक आज देश के केवल 6 राज्यों में ही विधान परिषद का अस्तित्व बचा है।कई राज्यों ने विधान परिषद को ही भंग कर दिया है।आजादी से पहले स्थापित कर्नाटक की विधान परिषद को 140 वर्षों का इतिहास है। अभी तक 650 से अधिक लोग इस सदन के सदस्य बने है। ऐसी स्थिति में विधान परिषद को ही भंग करना तार्किक नहीं है। विधानसभा में पेश किए जानेवाले कई विधेयकों पर ठीक ढंग से बहस नहीं होती है। ऐसे में विधान परिषद में ऐसे विधेयकों पर बहस के माध्यम से इन विधेयकों की खामियां दूर करने का अवसर सरकार को मिलता है।विप को भंग करना समस्या का समाधान नहीं

विधान परिषद के पूर्व सभापति बीएल शंकर ने विधान परिषद को भंग करने की मांग का पुरजोर विरोध करते हुए कहा कि इस बात को लेकर कोई दो राय नहीं हो सकती है कि मंगलवार को विधान परिषद में केवल 20 मिनट की कार्यवाही ने इस सदन की 140 वर्षों की परंपरा को कलंकित कर दिया है। सदन में हुई इस घटना के लिए राज्य के तीनों प्रमुख दल भाजपा, कांग्रेस तथा जनता दल एस समान रूप से जिम्मेदार है। सदन की कार्यवाही के दौरान दलगत राजनीति ने सभापति तथा उपसभापति को अपना मोहरा बनाया था। लेकिन विधान परिषद को ही भंग कर देना इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। इन तीनों दलों को इस मामले को लेकर आत्मावलोकन करते हुए सदन में ऐसे हालात की पुनरावृत्ति ने हो इसके लिए हरसंभव प्रयास करने चाहिए।

राजनीतिक दल आत्मावलोकन करें

विधान परिषद के पूर्व सदस्य डीएस वीरय्या के अनुसार राज्य के प्रमुख राजनीतिक दलों को विधान परिषद के प्रत्याशियों के चयन पर विशेष ध्यान देना होगा। मैसूरु महाराजाओं के कार्यकाल में मैसूरु जनप्रतिनिधि सभा के नाम से गठित इस सदन की एक उज्ज्वल परंपरा है।इसकी रक्षा करना राजनीतिक दलों का दायित्व है। इतिहास गवाह है कि इस सदन ने विधानसभा की ओर से पारित किए गए कई विधेयकों पर बहस कर विधेयकों की त्रुटियां दूर करने के लिए प्रशासन को मजबूर किया है।

उल्लेखनीय है कि 75 सदस्यीय विधान परिषद के लिए स्थानीय नगर निकायों से 25, विधान सभा से 25, शिक्षक क्षेत्र से 7, स्नातक क्षेत्र से 7 प्रत्याशियों का चयन किया जाता है। इसके अलावा समाजसेवा, संगीत, लोककला, शिक्षा जैसे क्षेत्रों में योगदान देनेवाले 11 जनों को इस सदन के लिए मनोनित किया जाता है।

Sanjay Kulkarni Reporting
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