दु:ख का कारण है इच्छा-आचार्य महाश्रमण

उग्र विहारों की श्रंखला में आज फिर छब्बीस किलोमीटर की पद यात्रा

By: Yogesh Sharma

Updated: 03 Jan 2020, 08:15 PM IST

टेकलकोटे (कर्नाटक). सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति की अलख जगाते हुए शुक्रवार को फिर २६ किलोमीटर की पदयात्रा की। सूरज की तीखी धूप और सड़क का ऊबड़-खाबड़पन भी उनके चरणों को नहीं रोक पाया। पहाड़ों, खेतों से युक्त इस हरे-भरे क्षेत्र का सौन्दर्य आचार्य की उपस्थिति से और भी बढ़ गया। टेकलकोटे गांव में स्थित एस.एच.एम.एस. गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज में आयोजित धर्मसभा में आचार्य ने कहा कि इच्छा आकाश के समान अनंत होती है। सुखी बनने का एक महत्वपूर्ण सूत्र है। इच्छाओं का परिसीमन करना। श्रावक के बारहव्रतों में पांचवा है इच्छा परिमाण। इच्छा दु:ख का कारण है और संतोष सुख-शांति का आधार है।
जीवन के अंतिम समय में अन्य चिन्ताओं को छोड़कर आत्मा पर विशेषकर ध्यान देना चाहिए। आत्मा शाश्वत है और शरीर नश्वर है। जितनी आत्मस्थता रहती हैै, व्यक्ति उतना ही सुखी रहता है। जितनी पदार्थासक्ति रहती है, वह उतना ही दु:खी बनता है। आदमी अपनी इच्छाओं का परिसीमन कर आत्मस्थ रहने का अभ्यास करे, यह काम्य है।Ó विद्यालय के प्राचार्य वैद्यनाथ ने कहा-'हम बहुत भाग्यशाली हैं कि आचार्य महाश्रमण हमारे इस संस्थान में आए हैं। हमने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसे महापुरुष, महातपस्वी संत हमारे प्रांगण में आएंगे। हम इस दुर्लभ अवसर को पाकर अभिभूत हैं।
आचार्य ने उन्हें अहिंसा यात्रा की अवगति देते हुए मंगल प्रेरणा प्रदान की। टेकलकोटे कमिशनर कमलम्मा भी कार्यक्रम में विशेष रूप से उपस्थित थीं। टेकलकोटे के विधायक सोमलगप्पा ने भी आज सपरिवार आचार्य के दर्शन कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। पदयात्रा के दौरान मार्गवर्ती गांवों के सैंकड़ों लोग आचार्य के दर्शन और आशीर्वाद से लाभान्वित हुए।

Yogesh Sharma Reporting
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