लोभ को समुद्र जैसा विशाल न बनाइए: डॉ. महाप्रज्ञा

श्रीरंगपट्टण में प्रवचन

By: Santosh kumar Pandey

Updated: 14 Sep 2020, 10:24 PM IST

बेंगलूरु. श्रीरंगपट्टण के दिवाकर गुरु मिश्री दरबार में साध्वी डॉ. कुमुदलता आदि ठाणा चातुर्मास के लिए विराजित हैं। साध्वी डॉ. महाप्रज्ञा ने कहा कि मनुष्य क्रोध को ही पाल कर बैठे ऐसा नहीं है। लोभ भी समुद्र की विशालता को भी शरमा दे ऐसा है। सर्व दोषों के शिकार समस्त शरीर में सर्प का जहर व्याप्त होता है। वैसे लोभ रूपी सर्प के दंश से तृष्णा रूपी जहर मानव आत्मा के प्रति प्रदेश में व्याप्त हो गया है। इंसान को तृष्णा की इस पराकाष्ठा ने कृपण बनाया। जितना मिले उसमें संतोष नहीं।

तृष्णा के इस विष ने दरिद्र बना दिया है। जिन्दगी का सुनहरा समय, मानव जीवन के अमूल्य क्षण शरीर एवं मन की सारी शक्ति धन प्राप्त करने की लालसा में काम पर लगा दी। सुख-चैन एवं नींद को भी धन की लालसा में नष्ट कर दिया।

पुण्योदय से व्यक्ति धनवान तो हो गया पर उसकी बहुत बड़ी कीमत चुकाई। उन्होंने कहा कि क्रोध और लोभ दो ही कमजोरी होती, तो फिर भी अनुभव से बोध पाठ लेकर दूर करने का प्रयत्न करते हैं।
बेंगलूरु के गुरुभक्त श्रीपाल खाबिया, बबिता जैन, अशोक धोका, कांतिलाल बाफना, अशोक गादिया, गणपतराज धोका आदि ने साध्वी के दर्शन किए।

Santosh kumar Pandey Desk
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