scriptDraupadi walked with a sword in her hands and reached the dargah | Karga: हाथों में तलवार लिए चली ‘द्रौपदी’ और पहुंच गई दरगाह | Patrika News

Karga: हाथों में तलवार लिए चली ‘द्रौपदी’ और पहुंच गई दरगाह

  • बेंगलूरु में धूमधाम से मनाया ऐतिहासिक ‘करगा’ महोत्सव

बैंगलोर

Published: April 17, 2022 10:30:07 pm

बेंगलूरु. घंटनाद के बीच गोविंदा-गोविंदा की गूंज, सिर पर करगा लिए द्रौपदी के रूप में सजे पुजारी ज्ञानेन्द्र गौड़ा की झलक पाने की बेताबी और दूर-दूर तक हजारों श्रध्दालु। यह नजारा था शनिवार रात तिगलरपेट स्थित धर्मराय मंदिर से निकाली गई करगा शोभायात्रा ( karga festival) का।
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पुजारी ज्ञानेन्द्र ने लगातार ग्यारहवें साल चमेली के फूलों की झालर के बीच सजा आदि शक्ति का पवित्र रूप सिर पर धारण किया था। द्रौपदी के रूप में जब उन्होंने मंदिर परिसर से बाहर कदम बढ़ाया तो उनका स्वागत बरखा की बूंदों से हुआ लेकिन आस्था का उल्लास ऐसा था कि कदम बढ़ते ही गए। बरखा की झड़ी के बावजूद हजारों श्रध्दालु ऐतिहासिक आयोजन की झलक पाने के लिए नगरथपेट और आसपास के इलाकों में पहुंचे थे। समूचे इलाके को विद्युत झालरों की मोहक सजावट से झिलमिल कर दिया गया था।
कई सदियों से मनाया जा रहा यह उत्सव आदि शक्ति के रूप में धरती पर द्रौपदी की वापसी के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इसमें शामिल होने के लिए श्रध्दालुओं की बेताबी के पीछे जहां परम्परा के प्रति सम्मान है वहीं यह मान्यता भी कि करगा देखने वाला कई जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है।
लगभग दो साल के बाद बेंगलूरु की पहचान बन चुके करगा का पुराना वैभव दिखाई दिया। बीबीएमपी ने उत्सव के लिए मंदिर अधिकारियों को 50 लाख रुपए आवंटित किए थे। किसी अप्रिय घटना को रोकने के लिए कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई थी, सीसीटीवी लगाए गए थे और जुलूस मार्ग पर बीबीएमपी स्वास्थ्य कर्मचारियों को तैनात किया गया था।
साम्प्रदायिक सौहार्द की मिसाल

देश के कई हिस्सों में जब सम्प्रदायों के बीच दूरी पैदा करने की कोशिशें हो रहीं हैं, ऐसे में करगा महोत्सव साम्प्रदायिक सौहार्द की मिसाल है। पिछले दो सौ सालों से द्रौपदी के साथ करगा का जुलूस कॉटनपेट स्थित हजरत तवक्कल शाह दरगाह पहुंचता है और उसके बाद विभिन्न इलाकों से होते हुए वापस धर्मराय मंदिर लौटता है। उल्लेखनीय है कि धर्मराय मंदिर (युधिष्ठिर मंदिर) संभवत: देश में धर्मराज का इकलौता मंदिर है जो गंगा राजाओं के शासन काल में बना था। उसके बाद से ही लगभग 800 सालों से करगा की परम्परा चली आ रही है।

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