ECMO से बची हाई रिस्क नवजात की जान

इसीएमओ एक लाइफ सपोर्ट सिस्टम है, जो शरीर को उस समय ऑक्सीजन सप्लाई करने में मदद करता है, जब मरीज के फेफड़े या दिल यह काम नहीं कर पा रहे हों।

By: Nikhil Kumar

Published: 03 Dec 2019, 09:36 PM IST

- एमएएस व निओनेटल सेप्सिस के कारण श्वसन तंत्र देने लगा था जवाब

बेंगलूरु.

मेकोनियम एस्पिरेशन सिंड्रोम (एमएएस) व निओनेटल सेप्सिस (बैक्टीरिया जनित रक्त संक्रमण) के कारण जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे एक नवजात को शहर के एक निजी अस्पताल के चिकित्सकों ने नई जिंदगी दी।

नारायण हेल्थ सिटी में बाल रोग विभाग के प्रमुख डॉ. राजीव अग्रवाल ने मंगलवार को बताया कि एमएएस, एक मेडिकल कंडीशन है जो नवजातों को चपेट में लेती है। गर्भ में होने के दौरान नवजात के पेट में मेकोनियम नामक काला पदार्थ collect होता है। जो उसका पहला मल होता है। गर्भ में ही मल त्यागने के बाद कई बार मल फेफड़ों में चला जाता है। जिससे शिशु को सांस लेने में भयंकर परेशानी होती है। पारंपरिक प्रबंधन के बावजूद एमएएस के साथ जन्म लेने वाले 10 फीसदी शिशुओं को बचाने में सफलता नहीं मिलती है।

एक साथ एमएएस और सेप्सिस होने के कारण नवजात की स्थिति गंभीर थी। श्वसन तंत्र ने जवाब देना शुरू कर दिया था। एनआइसीयू में नवजात वेंटिलेटर पर था लेकिन विशेष सफलता नहीं मिली। जिसके बाद एक्स्ट्रा कॉरपोरियल मैम्बे्रन ऑक्सीजेनेशन (Extracorporeal Membrane Oxygenation) का सहारा लिया गया।

इसीएमआ के प्रमुख डॉ. रियान शेट्टी ने बताया कि इसीएमओ एक लाइफ सपोर्ट सिस्टम है, जो शरीर को उस समय ऑक्सीजन सप्लाई करने में मदद करता है, जब मरीज के फेफड़े या दिल यह काम नहीं कर पा रहे हों। इसीएमओ के प्रयोग के लिए शरीर की एक नस में से खून को निकालकर उसे ऑक्सीजेनेटर मशीन से जोड़ दिया जाता है। जिससे खून दिल तथा फेफड़ों का बाईपास कर प्रवाहित होता रहता है। इसीएमओ काफी प्रभावी सपोर्ट उपकरण है जो मरीज को ठीक होने का मौका देता है। इसीएमआ ने नवजात के हृदय और फेफड़ों को ठीक होने का अवसर दिया। करीब 96 घंटों में नवजात का फेफड़ा प्राकृतिक रूप से काम करने लगा।

Nikhil Kumar Reporting
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