शिक्षा भूषण पुरस्कार: अध्यापन से चारों पुरुषार्थ संभव

Shankar Sharma

Publish: Sep, 11 2017 04:54:00 (IST)

Bangalore, Karnataka, India
शिक्षा भूषण पुरस्कार: अध्यापन से चारों पुरुषार्थ संभव

अध्यापन एक पवित्र पेशा है जिससे धर्म, अर्थ काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थ संभव हैं

बेंगलूरु. अध्यापन एक पवित्र पेशा है जिससे धर्म, अर्थ काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थ संभव हैं। आचार्य दयानंद भार्गव ने यह बात रविवार को यहां शिक्षक सदन में अखिल भारतीय राष्ट्रीय शिक्षक महासंघ तथा शैक्षिक फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित समारोह में शिक्षा भूषण पुरस्कार स्वीकार करने के दौरान कही।


उन्होंने कहा कि अब तक उन्हें जो पुरस्कार मिले, वे सरकारों से मिले है लेकिन आज का शिक्षा भूषण पुरस्कार उनके लिए इसलिए अधिक मायने रखता है क्योंकि यह अध्यापकों से मिला है और बिना मांगे मिल रहा है। बिना मांगे मिली वस्तु परमात्मा का प्रसाद होती है। इसलिए वे इस पुरस्कार को मां सरस्वती का प्रसाद मानते हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षकों को विद्यार्थियों को ज्ञान देने में जो आनंद की अनुभूति होती है, वह बेमिसाल है। यह आनंद शिक्षकों का जन्मसिद्ध अधिकार है और किसी परिस्थिति के सापेक्ष न होकर वास्तविक आनंद होता है।


उन्होंने कहा कि ज्ञानदान यज्ञ में जुटे शिक्षक समचित्त तथा शांत बने रहें इसके लिए उनकी अन्य समस्याओं का समाधान करना प्रशासन का दायित्व है। शास्त्रों में बताया गया है कि समाज में किसी सम्राट से भी ज्ञानी व्यक्ति का महत्व अधिक है। ज्ञानी व्यक्ति समाज में संस्कारों का सिंचन करता है।

यह संस्कार ही समाज की दिशा और दशा सुनिश्चित करते हैं। डॉ.सतीश चंद्र मित्तल ने कहा कि स्वामी दयानंद सरस्वती, लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय जैसे महापुरुषों ने शिक्षा के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास किया था। लेकिन आज हमारे देश में शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र की अनदेखी की जा रही है। यह क्षेत्र प्रशासनिक उदासीनता का शिकार है। शास्त्रो में कहा गया है कि ‘सा विद्या या विमुक्तये’ इस उक्ति को समझकर शिक्षा को संकुचित परिधि से मुक्त करना होगा।


मूर्ति व मित्तल भी सम्मानित
समारोह में इतिहासकार डॉ चिदानंद मूर्ति तथा सतीश चंद्र मित्तल को भी शिक्षा भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अखिल भारतीय राष्ट्रीय शिक्षक महासंघ के पदाधिकारी जे पी सिंघल, राष्ट्रीय संगठन मंत्री महेंद्र कपूर तथा रामकृष्ण मठ के प्रमुख मंगलनाथानंद स्वामी तथामहासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विमलप्रसाद अग्रवाल ने विचार रखे।

आत्मावलोकन करें शिक्षक : जोशी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह सुरेश (भैय्याजी) जोशी ने कहा कि देश में शिक्षा की मौजूदा स्थिति देखकर वेदना होती है। शिक्षा व्यक्तित्व विकास का सशक्त माध्यम है। लेकिन हम आज विद्यार्थियों को कैसी शिक्षा प्रदान कर रहे हैं, इसे लेकर चिंतन-मंथन की जरूरत है। उन्होंने कहा कि शिक्षकों को आत्मावलोकन करना होगा कि क्या मौजूदा शिक्षा अपने वास्तविक लक्ष्य से भटक रही है। अल्पकालीन लाभ के लिए हो रहीं शिक्षा नीति के साथ खिलवाड़ देश के लिए घातक साबित होगा। विद्यार्थियों को प्रखर राष्ट्रवाद के संस्कार देने होंगे। शिक्षा एक संस्कार है जो देश का भविष्य निर्धारण करती है।

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