चारित्रिक गुणों से आंतरिक सौंदर्य को निखारें: आचार्य देवेंद्रसागर

राजाजीनगर में प्रवचन

By: Santosh kumar Pandey

Published: 25 Aug 2020, 09:07 PM IST

बेंगलूरु. आचार्य देवेंद्रसागर सूरी ने सलोत जैन आराधना में जारी प्रवचन में कहा कि हम यदि सुंदर हैं तो कभी उसका गुमान न करें, क्योंकि शारीरिक सुंदरता तो आनी-जानी है। जिस तरह शारीरिक सुंदरता को उसकी उचित देखभाल से बढ़ाया जा सकता है, ठीक उसी तरह आंतरिक सौंदर्य को निखारने-संवारने के लिए चारित्रिक गुणों की आवश्यकता होती है।

महाकवि कालिदास, दार्शनिक सुकरात, हास्य सम्राट चार्ली चैपलिन, अब्राहम लिंकन, नेपोलियन आदि महापुरुषों ने अपनी बाहरी कुरुपता व साधारण कद काठी की भरपाई अपने-अपने क्षेत्र में अर्जित महान उपलब्धियों के जरिए की थी। ऐसी और भी कितनी ही महाविभूतियां हैं जो बाहरी सौंदर्य के मानदंडों पर कहीं भी नहीं ठहरतीं। लेकिन उन्होंने अपने आंतरिक गुणों व विशेषताओं की प्रखरता से ऐसा मुकाम हासिल किया जो उन्हें इतिहास पुरुष बना गया।

आचार्य ने कहा कि आंतरिक सौंदर्य से भरपूर व्यक्ति के बाहरी चेहरे मोहरे, वेश-भूषा व हावभाव पर इतना ध्यान ही नहीं जाता, हम उसके आंतरिक व्यक्तित्व की चमक से इतने अभिभूत होते हैं कि वे हर हालत में हमें सुंदर ही लगते हैं, जबकि केवल अपने बाहरी व्यक्तित्व से आकर्षित करने वाले व्यक्ति पर हमारी पैनी निगाह टिकी रहती है।

किसी भी छोटी-मोटी कमी या त्रुटि के कारण उसका आकर्षण हमारी नजरों में कम होने लगता है और कुछ समय बाद उसकी छवि धूमिल हो जाती है। इसकी अनगिनत मिसालें हम आए दिन देखते हैं। कोई अपराधी भले ही कितना रूपवान हो, हमें आकर्षक नहीं लगता। लेकिन हमारे आसपास के सामान्य लोग भी हमारे आत्मीय बन जाते हैं।

गुणों के सामने व्यक्ति का रूपाकार एक सीमा के बाद बेमानी हो जाता है और अंतत: वही हमारे जीवन में बसता है, जो हमारी आत्मा को छू लेता है। इसीलिए महापुरुषों ने बाहरी सुंदरता का बखान नहीं किया है, बल्कि कई बार उसे व्यक्ति के विकास में बाधा भी माना गया है।

Santosh kumar Pandey Desk
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