क्षमायाचना कर मैत्री स्थापित करें-आचार्य देवेंद्रसागर

धर्मसभा का आयोजन

By: Yogesh Sharma

Published: 11 Sep 2021, 07:46 PM IST

बेंगलूरु. राजस्थान जैन मूर्तिपूजक संघ जयनगर में विराजित आचार्य देवेंद्रसागर सूरीश्वर ने पर्युषणा पर्व के अंतिम दिन धर्म प्रवचन में कहा कि क्षमापना तो पर्वाधिराज के प्राणसमान हैं, जिस तरह हजार कि.मी. रेल की पटरी से एक इंच पटरी भी यदि टूट जाए, तो ट्रेन लुढक़ जाती है। उसी तरह मन में एक जीव के प्रति भी यदि द्वेष का अंश रह गया, तो आपकी आराधना की पूरी ट्रेन ही लुढक़ जाएगी। जिस तरह कार में आगे देखने वाला अकस्मात से बच जाता है, ठीक उसी तरह भूतकाल को भूलकर जो व्यक्ति भविष्यमें आगे बढऩा चाहता है, वह ही दुर्गतिओं से बच सकता है। कांटे देखने वालों को जिस तरह गुलाब की सुवास नहीं मिलती, ठीक उसी तरह अन्य की भूल देखने वाला कभी भी अन्य के प्रेम को प्राप्त नहीं कर सकता। आचार्य ने कहा कि जो नम्रता से अपनी भूल की क्षमा याचना नहीं कर सकता, वह सुखे साग जैसा सख्त होने से मुर्दा समान है और जो अन्य की भूल पर क्षमा प्रदान नहीं कर सकता वह दुनिया का सबसे बड़ा कंजूस है। जो स्वयं के घर में ही स्वयं की कब्र खोदता है।आपकी छोटी सी क्षमा भावना आपको आत्मिक सुख देने वाली होगी। संवत्सरी प्रतिक्रमण कर हाथ जोडक़र ‘मिच्छामि दुक्कड्म’ कह देना मात्र ही हमारा कर्तव्य नहीं है अपितु जीवन में अथवा पूरे वर्ष में जिस-जिस के साथ बैर-विरोध हुए हों, जिस-जिस को हमारे कारण कोई तकलीफ पहुंची हो, उन सभी से हम क्षमायाचना कर मैत्री स्थापना करें। व्यर्थ, अर्थहीन क्षमापना न करें। बार-बार अपराध कर बार-बार क्षमा मांगना कोई मूल्य नहीं रखता। गलतियों की पुनरावृत्ति न करें। अहिंसा की पहली और अंतिम शर्त क्षमा ही है। क्षमा, अपने को जीत लेने का उपाय है। क्षमापन पर्व, बेशक एक पंथ की खोज है लेकिन यह पर्व किसी एक पंथ का ना होकर सभी का है।

Yogesh Sharma Reporting
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