अंग्रेजी के कारण खतरे में क्षेत्रीय भाषाओं का अस्तित्

अंग्रेजी के कारण खतरे में क्षेत्रीय भाषाओं का अस्तित्

Shankar Sharma | Publish: Apr, 23 2019 12:18:08 AM (IST) Bangalore, Bangalore, Karnataka, India

हमने अंग्रेजों को हरा दिया है लेकिन अंग्रेजी से हार चुके हैं। अंग्रेजी के व्यामोह के कारण देश की सभी क्षेत्रीय भाषाओं का अस्तित्व खतरे में है।

बेंगलूरु. हमने अंग्रेजों को हरा दिया है लेकिन अंग्रेजी से हार चुके हैं। अंग्रेजी के व्यामोह के कारण देश की सभी क्षेत्रीय भाषाओं का अस्तित्व खतरे में है। ऐसे में क्षेत्रीय भाषाओं की रक्षा एक बड़ी चुनौती है। ज्ञानपीठ पुरस्कृत लेखक डॉ चंद्रशेखर कंबार ने यह बात कही।

रविवार को नेशनल कॉलेज के सभागार में कश्मीर के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.अग्निशेखर की मेरी प्रिय कविताएं काव्य संग्रह का कन्नड़ अनुवाद ‘जीवन रागा’ पुस्तक के लोकार्पण समारोह में भाग लेते हुए उन्होंने कहा कि यह कैसी विडंबना है कि हमारे देश के दो राज्यों के निवासियों का संवाद अंग्रेजी के बगैर संभव नहीं हो रहा है। आजादी की जंग के बाद ब्रिटिश चले गए लेकिन वे यहां अंग्रेजी छोड़ कर गए जिसे हमने आज आधुनिक शिक्षा के लिए अनिवार्य समझा है।


अगर क्षेत्रीय भाषाओं की अनदेखी बरकार रखेंगे तो आनेवाली पीढिय़ां हमें कभी माफ नहीं करेगी। हमारी संस्कृति, हमारी पहचान के लिए हमें हर कीमत पर क्षेत्रीय भाषाओं का अस्तित्व बचाना होगा। उन्होंने कहा कि साहित्यक्षेत्र में सक्रिय कवि तथा लेखक ही संवादहीन हो गए हैं।


कोई हिंदी, गुजराती, कोई मराठी, कोई बंगाली साहित्यकार किस तरह के साहित्य का सर्जन कर रहा है इस बात का दक्षिण राज्यों के साहित्यकारों को कोई पता नहीं है। यह स्थिति चिंताजनक है। हमें इस मामले को गंभीरता से लेते हुए देश के विभिन्न भाषाओं के साहित्यकारों के बीच निरंरत संवाद सुनिश्चित करना होगा।


आज भी पांच लाख कश्मीरी पंडित शरणार्थी
इस अवसर पर कवि अग्निशेखर ने कहा कि वर्ष 1990 के पश्चात जम्मू कश्मीर से विस्थापित पांच लाख से अधिक कश्मीरी पंडित आज 30 वर्षों के बाद भी अपने ही देश में शरणार्थी बन कर टेंट में जीवन बिता रहे हैं। ऐसे लोगों की पीड़ा तथा संवेदनाओं को उन्होंने मेरी प्रिय कविताएं काव्य संग्रह के माध्यम से व्यक्त करने का प्रयास किया है।
कार्यक्रम में साहित्यकार दोड्डरंगे गौड़ा तथा कविता संग्रह का हिंदी से कन्नड़ भाषा में अनुवाद करने वाले प्रो. नरसिंहमूर्ति उपस्थित थे। संचालन डॉ. उषा राणी राव ने किया।

कश्मीर के पंडितों की पीड़ा की अनदेखी
उन्होंने कहा की कश्मीर के जानेमाने हिंदी कवि अग्निशेखर की कविताओं में हमें वहां के शरणार्थियों की संवेदना का दर्शन होता है। कश्मीर के पंडितों की पीड़ा की साहित्य क्षेत्र ने अनदेखी की है। इन कविताओं में किसी व्यक्ति को अपनी गांव की मिट्टी से अपनी गांव की नदी से बिछडने पर कैसी अनुभूति होती है इसका मार्मिक चित्रण देखने को मिलता है। ऐसे संवेदनशील साहित्य का देश की सभी क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद होना चाहिए।

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