600 रोगियों का नि:शुल्क उपचार

600 रोगियों का नि:शुल्क उपचार

Rajendra Shekhar Vyas | Publish: Sep, 10 2018 07:29:04 PM (IST) Bengaluru, Karnataka, India

कर्नाटक मारवाड़ी समाज व मानव चैरिटीज की ओर से नेत्र जांच शिविर

बेंगलूरु. कर्नाटक मारवाड़ी समाज व मानव चैरिटीज की ओर से डॉ सोलंकी आई हॉस्पिटल के सहयोग से मैसूरु रोड स्थित गवर्नमेंट हाइ स्कूल में आयोजित नेत्र जांच शिविर में 600 जरूरतमंदों का नि:शुल्क उपचार कर 400 मरीजों को चश्में वितरित किए गए। साथ ही, 25 लोगों का मोतियाबिंद ऑपरेशन के लिए चयन किया गया। समाजसेवी महावीर अग्रवाल ने दीप प्रज्वलित किया। केएमएस अध्यक्ष आनंद गिन्डोरिया ने स्वागत किया। प्रोजेक्ट हेड बिमल सरावगी ने केएमएस की गतिविधियां बताई। केएमएस के पूर्वअध्यक्ष राजेश मोदी, अभिमन्यु छापोलिया, आनंद अग्रवाल, अनिल अग्रवाल, रंजन भावसिका, उपाध्यक्ष अंजनी बंका, शिव टेकरीवाल, कोषाध्यक्ष संदीप पोद्दार आदि उपस्थित थे। संचालन राहुल सिंघानिया ने किया।

अपने भीतर झांके और देखेें
साधु-संतों के लिए 28 दिवसीय मूलाचार संगोष्ठी आयोजित
श्रवणबेलगोला (हासन) . श्रवणबेलगोला स्थित भंडार बसदी में पहली बार साधु-संतों के लिए आयोजित 28 दिवसीय मूलाचार संगोष्ठी रविवार को संपन्न हुई।
आचार्य पुष्पदंत सागर व आचार्य वर्धमान सागर के आशीर्वाद एवं आचार्य सुविधि सागर के निर्देशन में स्वामी अनुमोदना से मूलाचार संगोष्ठी हर तरह से समयानुकूल, साधनानुकूल व अगमानुकूल रही। यह संगोष्ठी भी 125 साधुओं के लिए मार्गदर्शिका साबित हुई। संगोष्ठी में पिछले 28 दिनों में 36 साधु-संतों व आर्यिकाओं ने हिस्सा लेकर अपने विचार आलेख के जरिए सभी के समक्ष रखे।
समापन अवसर पर आचार्य वर्धमान सागर ने बीते 50 वर्षों के अपने अनुभव सभी के समक्ष साझा किया। उन्होंने मुनियों की चर्या को ध्यान में रखकर लिखे गए जैन धर्म के अतिप्राचीन मूलाचार ग्रंथ पर प्रकाश डालते हुए अनेक ग्रंथों को सामने रख विचार व्यक्त किए। आचार्य ने पहली बार साधु-संतों के समक्ष बोलने का अवसर मिलने पर खुद को सौभाग्यशाली बताया। आचार्य पुष्पदंत सागर के द्वितीय शिष्य प्रज्ञासागर मुनि ने मुनियों के गुणों पर अपनी बात रखते हुए कहा कि यह एक ऐसा विषय है, जिसे आज के युग में सभी के सामने रखना ज्यादा जरूरी है क्योंकि लोग पूरी बातों को समझते नहीं है और मुनियों पर अंगुली उठाने लगते हैं। संगोष्ठी के प्रेरणा सूत्र आचार्य सुविधि सागर के अथक प्रयास से इस संगोष्ठी में बहुत कुछ सीखने को मिला है। मुनि प्रज्ञा सागर ने कहा कि खण्डागम की पहली पुस्तक में साधु कैसा होता है, इस बात को बतलाने के लिए एक गाथा 'सीह, गय, वसह, मिय,पशु, मारु द सुरुवहि मंदररिंदु मणि..'आई है अर्थात साधु सिंह के समान पराक्रमी, गज के समान स्वाभिमानी, वृषभ के समान भद्र प्रकृति वाले, मृग के समान सरल, पशु के समान निरीह अर्थात सर्वत्र बिना रुकावट के बहने वाले, सूर्य के समान तेजस्वी या कल तत्वों के प्रकाशक, समुद्र के समान गंभीर होते हैं। मंदराचल 'सुमेरु' के समान परिषह और उपसर्गों के आने पर अकम्प-अडोल रहने वाले चंद्रमा के समान दूसरे के बनाए हुए अनियत आश्रय वसतिका आदि में रहने अंबर अर्थात आकाश के समान निर्लेप और सदाकाल परम पद अर्थात मोक्ष का अन्वेषण करने वाले होते हैं। उन्होंने कहा कि इस आलेख प्रवचन को सुनने, पढऩे के बाद हम स्वयं अपने भीतर झांके-देखेंं और जानें की मूलाचार के अनुसार हम किस स्थिति में हैं। दूसरा हमें अपनी स्थिति का भान कराए, उससे पहले हमें स्वयं में सुधार लाना चाहिए। श्रमण संस्था को सुदृढ़ और सुसंस्कृत बनाने के लिए ऐसी संगोष्ठी की वर्तमान में महत्ती आवश्यकता है। अंतिम दिन उपाध्याय उर्जयंत सागर ने भी विचार रखे।

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