सीएम के दखल के बाद खत्म हुई मध्याह्न भोजन कर्मियों की हड़ताल

हजारों बच्चे भोजन से वंचित

By: Ram Naresh Gautam

Published: 10 Feb 2018, 01:03 AM IST

बेंगलूरु. मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या के दखल के बाद मध्याह्न भोजन कर्मचारियों की हड़ताल शुक्रवार देर रात खत्म हो गई। मुख्यमंत्री ने मानदेय में वृद्धि की बात मान ली और कहा कि वे बजट तक प्रतीक्षा करें। सरकार उनका पूरा ध्यान रखेगी। मध्याह्न भोजन योजना से जुड़े एक लाख से भी ज्यादा रसोइयों व अन्य कर्मचारियों की हड़ताल पांच दिन से चल रही थी।
वेतन वृद्धि व अन्य मांगों को लेकर हुई हड़ताल का खामियाजा बच्चों को भुगतना पड़ रहा है। शुक्रवार को प्रदेश के विभिन्न सरकारी व अनुदानित स्कूलों के हजारों बच्चे भोजन से वंचित रह गए। हड़ताल के मद्देनजर लोक शिक्षण विभाग ने स्कूल निगरानी व विकास समिति (एसडीएमसी) को निर्देश जारी कर यह सुनिश्चित करने को कहा है कि बच्चों को भोजन मिले और इस काम में वे प्रभावित स्कूल प्रबंधनों की हर संभव मदद करें। प्रदेश में शुक्रवार को मिड डे मील सेवा काफी हद तक बाधित रही। शहर व आसपास के इलाकों में तो हालात नियंत्रित हैं और गैर सरकारी संस्थानों की मदद से भोजन की आपूर्ति की जा रही है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को भूखे रहना पड़ रहा है।
महासंघ के सदस्य स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों से मुलाकाल कर चुके हैं। बजट में समस्या के समाधान के आश्वासन के बावजूद कर्मचारियों ने मांगें पूरी होने तक हड़ताल जारी रखने की घोषणा की है। महासंघ के सदस्यों ने मुख्यमंत्री सिद्धरमय्या हस्तक्षेप कर मांगें पूरी करने की अपील की है। महासचिव अवरेगेरे चंद्रू ने कहा कि अब प्रदेश के सभी कर्मचारियों को काम ठप करने के निर्देश दिए गए हैं। तालुक और जिला स्तर पर भी कर्मचारियों ने अनिश्चितकालीन प्रदर्शन व हड़ताल शुरू कर दी है। एटक व सीटू ने भी हड़ताल का समर्थन किया है। चंद्रू ने कहा, प्रदेश में एक लाख १८ हजार से भी ज्यादा कर्मचारी मिड डे मील योजना से जुड़े हुए हैं। 48 हजार से भी ज्यादा सरकारी व अनुदानित स्कूलों के करीब 56 लाख बच्चों को भोजन मिलता है। हड़ताल का उद्देश्य इन बच्चों को भूखा रखना नहीं बल्कि हक की लड़ाई है। मजबूरन हड़ताल का रास्ता अपनाना पड़ा। उन्होंने बताया कि करीब 10 हजार कर्मचारी पहले से ही फ्रीडम पार्क में प्रदर्शन कर रहे हैं। शुक्रवार को प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से 10-15 हजार कर्मचारी बेंगलूरु पहुंचे और प्रदर्शन में शामिल हुए।


न करते बनता है न छोड़ते ...
हड़ताल में शामिल कर्मचारियों का कहना है कि वे मझदार में हैं। काम छोड़ते हैं तो मरते हैं और जारी रखते हैं तो भी परिवार पालना मुश्किल है। सरकार जो मानदेय या वेतन देती है उससे परिवार का पेट तक नहीं भरता है। कई महीनों तक मानदेय या वेतन के लिए इंतजार करना पड़ता है। सुलेखा (40) ने बताया कि रसोइयों को २२०० और सहायक कर्मचारियों को 2100 रुपए का मासिक मानदेय मिलता है। जबकि हर दिन सभी 6-8 घंटे तक काम करते हैं। राजेश्वरी (45) ने बताया कि वो करीब १५ वर्षों से सेवाएं दे रही है। हर दिन समय से सुबह 9 बजे स्कूल पहुंच काम शुरू करती है और दोपहर करीब 2 बजे काम समाप्त होता है। इसके बदले में मानदेय के रूप में 2200 रुपया मिलता है। रसोईया चंद्रम्मा (38) ने बताया कि खाना बनाने के अलावा कर्मचारी बर्तन धोते हैं। स्कूल की साफ-सफाई तक करते हैं। यहां तक की त्योहारों के दिन भी खाना पकाना पड़ता है। लेकिन सरकार मानदेय या वेतन के नाम पर मामूली रकम देती है। गत वर्ष सितंबर में भी कर्मचारियों ने जब प्रदर्शन किया था तो सरकार ने पैसे बढ़ाने की बात कही थी।

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