भगवान हमारे कर्मों में दखल नहीं देते: देवेंद्रसागर

राजाजीनगर में प्रवचन

By: Santosh kumar Pandey

Published: 17 Oct 2020, 10:28 PM IST

बेंगलूरु. राजाजीनगर के सलोत जैन आराधना भवन में प्रवचन के माध्यम से आचार्य देवेंद्रसागर ने कर्म सिद्धांत के ऊपर कहा कि शरीर धारण करने के बाद जो कुछ भी हम सोचते हैं, संकल्प करते हैं और स्थूल रूप में करते हैं, वही कर्म है। जैसे ही आत्मा मन-मस्तिष्क में प्रवेश करके संकल्प करना शुरू करती है, वहीं से कर्म बनना शुरू होता है। तो सोचना, बोलना, देखना, सुनना, खाना, पीना, उठना, बैठना, गाना, रोना, सोना, पढऩा आदि सब कर्म हैं। शरीर से लेकर आत्मा के माध्यम से की गई छोटी और बड़ी शारीरिक या मानसिक हलचल या क्रिया ही कर्म कहलाती है।

कर्मों की गति बहुत ही सूक्ष्म है, जिसे बड़े-बड़े विद्वान भी नहीं समझ पाते। कर्म का सिद्धांत बिना रुके निरंतर कार्य करता है। इसमें भगवान को देख-रेख करने की जरूरत नहीं पड़ती। इसलिए भगवान हमारे कर्मों में दखल नहीं देते। वे न तो सजा देते हैं और न ही कृपा करते हैं। सब अपने आप होता है। उनका काम है- विवेक प्रदान करके सही गलत का फर्क जानने का ज्ञान, मार्गदर्शन और शक्ति देना।

हमारे हाथ में केवल एक ऑप्शन है कि क्या कर्म करना है। एक बार कर्म कर दिया, फिर वह समाप्त नहीं होता। आत्मा का पहला कर्म है संकल्प। एक बार संकल्प किया तो फिर वह मिट नहीं सकता। अच्छे कर्म का भी फल मिलता है और बुरे कर्म का भी फल मिलता है। दोनों के खाते अलग-अलग हैं। जब तक बैलेंस शीट बराबर नहीं होती, जन्म और मरण का क्रम चलता रहेगा। इसलिए हर काम खूब सोच-समझकर करना चाहिए।

Santosh kumar Pandey Desk
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