राजस्थान के राजसी ठाट को जीवंत करेगा सोने का साफा

राजस्थान के राजसी ठाट को जीवंत करेगा सोने का साफा
राजस्थान के राजसी ठाट को जीवंत करेगा सोने का साफा

Santosh Kumar Pandey | Updated: 06 Oct 2019, 08:47:51 PM (IST) Bangalore, Bangalore, Karnataka, India

10 गज लम्बा व 530 ग्राम वजन का यह साफा पूरे चौबीस कैरेट सोने का है

बेंगलूरु. राजस्थानी संस्कृति और परम्परा का हिस्सा रहे राजस्थानी साफे आज भले ही कम दिखाई देने लगे हों लेकिन वक्त के गुबार से इनकी आन-बान-शान आज भी अछूती है। राजस्थान की चटख संस्कृति के चोखे रंग लिए साफे दूर से ही नजर आ आते हैं और जिसके सिर पर सजते हैं, उसका माथे की चमक बढ़ा देते हैं। जोशो-जूनून से अनुप्राणित राजस्थानी धरती का यह रंग यहां दक्षिण में भी खूब दिखाई देता है। विशेषकर, बेंगलूरु में इसे स्वाभिमान के साथ धारण करने वाले हजारों हैं। यही राजस्थानी साफा इन दिनों बेंगलूरु में चर्चा का विषय बना हुआ है। एक खास अवसर के लिए तैयार साफा पूरे चौबीस कैरेट सोने का है। कहने की जरूरत नहीं कि 10 गज लम्बा व 530 ग्राम वजन का यह साफा अलग और अनूठा तो होगा ही, इतिहास को भी जीवंत करनेवाला होगा। राजस्थान की राजपूताना संस्कृति को जाननेवालों का दावा है कि इस तरह के राजसी साफे राजे-रजवाड़े खास अवसरों पर पहना करते थे। बेंगलूरु में यह साफा बनवाया है कर्नाटक राजपूत समाज के अध्यक्ष व उद्योगपति मनोहर सिंह राठौड़ ने। यह साफा राठौड़ की बेटी की शादी में दूल्हा पहनेगा।
इस नायाब कल्पना को अमली जामा पहनाने में लगे फैशन स्टूडियो के संचालक भूपेंद्र सिंह शेखावत के अनुसार चांदी के महीन तारों के ताने-बाने को बनारस के कारीगरों के जादुई हाथों ने संवारा तो चांदी के तारों से बना साफ तैयार हो गया। लेकिन राठौड़ की इच्छा थी कि ऐसा ही साफा सोने का बनवाया जाए।

राजस्थान के राजसी ठाट को जीवंत करेगा सोने का साफा

सोने जैसी कीमती धातु में लगभग 10 गज लम्बे तारों का ताना- बाना बुनना और उसे केसरिया रेशम व सूती धागों के साथ बनाना अपने आप में एक चुनौती थी, जिसके लिए कोई भी कारीगर तैयार नहीं हो रहा था। शुरुआत के लिए 'बादला' के कारीगरों को ढूंढा गया जो इस कार्य को कर सकें। 'बादला' का कार्य लगभग 4 दशक से किसी ने नहीं किया है।

राजस्थान के राजसी ठाट को जीवंत करेगा सोने का साफाराजस्थान के राजसी ठाट को जीवंत करेगा सोने का साफा

एक जमाना था जब सोने और चांदी की जरी के पोशाक व साफे राजसी ठाट बाट की निशानी थे। उस जमाने में इनके कारीगरों की भी बहुत अहमियत थी। समय ने करवट बदली और और यह कला इतिहास के पन्नों का हिस्सा बन गई। लेकिन कहते हैं, जहां चाह होती है, वहां राह होती है। अथक परिश्रम व बनारस के कारीगरों के कमाल के हुनर का प्रमाण बन चुका साफा तैयार है और किसी के सिर की शोभा बढ़ाकर अपने अस्तित्व पर इठलाने को बेकरार है। बादला वर्क बेहद बारीक और कठिन काम माना जाता है और इसे पूरा करने में ज्यादा मेहनत और समय लगता है। यह साफा भी दर्जनों कारीगरों की कई महीने की मेहनत के बाद तैयार हुआ है।

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