मन का शुभ भाव ही पुण्य: साध्वी डॉ सुप्रिया

  • राजाजीनगर में प्रवचन

By: Santosh kumar Pandey

Published: 25 Sep 2021, 05:28 PM IST

बेंगलूरु. राजाजीनगर जैन स्थानक में साध्वी सुमित्रा के सान्निध्य में साध्वी डॉ श्री सुप्रिया ने कहा कि पुण्य वह तत्व है जो आत्मा को पवित्र बनाता है। जो मन को पवित्र बनाता है, वही पुण्य है। मन का शुभ भाव ही पुण्य है। भावों से ही विचार बनते है। भावों के आधार पर ही आत्मा कभी मलिन तथा कभी पवित्र हो जाती है।

पवित्र भावों से ही पुण्य का उपार्जन होता है। पुण्य एक ऐसी प्रवृत्ति है, जिसके द्वारा दूसरों को सुख पहुंचाया जाता है। पुण्य से ही सभी सुख-साधन प्राप्त होते हैं।

साध्वी ने कहा कि पुण्य का कार्य करते समय मन को प्रसन्नता होती है। हृदय में संतोष की अनुभूति होती है। कहते हैं, इस जन्म का पैसा अगले जन्म में काम नहीं आता लेकिन इस जन्म का पुण्य जन्मों तक काम में आता है। जिस प्रकार पाप के कर्मों को दुख पूर्वक भोगा जाता है ,उसी प्रकार पुण्य के कर्मों को सुख पूर्वक भोगा जाता है।

यही पाप और पुण्य जन्म और मरण के कारण बनते हैं। जैन धर्म में 9 प्रकार के पुण्य बताए गए है। अन्न पुण्य, पान पुण्य, लयन पुण्य, शयन पुण्य, वस्त्र पुण्य, मन पुण्य , वचन पुण्य, काय पुण्य और नमस्कार पुण्य।

Santosh kumar Pandey Desk
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