ऊंट के एंटीबॉडीज से होगा कैंसर जैसी बीमारियों का इलाज

चूहे या मनुष्य के एंटीबॉडीज की तुलना में बेहद प्रभावशाली, आइआइएससी और एनसीआरआइ की नायाब खोज

राजीव मिश्रा. बेंगलूरु.

भारतीय विज्ञान संस्थान (आइआइएससी) के वैज्ञानिकों की एक टीम ने राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान परिषद (एनसीआरआइ) बीकानेर, के सहयोग से भारतीय ऊंट में ऐसे एंटीबॉडीज की पहचान की है जो न सिर्फ कैंसर, सर्पदंश या वायरस संक्रमित बीमारियों के इलाज में बेहद कारगर होगा बल्कि आने वाले दिनों में जैव प्रौद्योगिकी (बायोटेक्नोलॉजी) का एक ऐसा शक्तिशाली उपकरण बनेगा जो वर्तमान एंटीबॉडी थेरेपी का स्थान ले लेगा।इस नवीनतम खोज को अंजाम देने वाली आइआइएससी और एनसीआरआइ टीम के नेतृत्वकर्ता डॉ अरविंद पी. ने बताया कि ऊंट में जिस एंटीबॉडी की खोज की गई है उसके अणु मनुष्य के एंटीबॉडीज के अणुओं की तुलना में दस गुणा छोटे हैं। एंटीबॉडी संक्रमण के कारण होने वाली बीमारियों से लडऩे में मदद करते हैं। मनुष्य एवं चूहों के एंटीबॉडीज के अणु आकार में बड़े होते हैं। ऊंट में दस गुणा छोटे अणु वाले एंटबॉडी की खोज में सफलता मिली है जो कैंसर जैसी बीमारियों के लिए की जाने वाली टारगेटेड थेरेपी में अत्यंत शक्तिशाली और प्रभावशाली उपकरण बनेंगे।

ऊंट के एंटीबॉडीज से होगा कैंसर जैसी बीमारियों का इलाज

बदल जाएगी टारगेटेड थेरेपी
डॉ. अरविंद ने बताया कि कई जीवाणु (बैक्टीरिया) ऐसे होते हैं जिनपर कभी कभी एंटीबायोटिक दवाओं का असर नहीं होता क्योंकि, ये एंटीबायोटिक रेसिसटेंट हो जाते हैं।ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उन बैक्टीरिया की कोशिका में मौजूद एफ्लक्स पंप एंटीबायोटिक दवाओं को बाहर फेंक देते हैं। टारगेटेड थेरेपी के दौरान ऊंट के एंटीबॉडीज का इस्तेमाल कर उन एफ्लक्स अणुओं की पहचान की जा सकती है, जो एंटीबायोटिक दवाओं को बाहर कर देते हैं। साथ ही ऊंट के एंटीबॉडी अणुओं के जरिए एफ्लक्स पंप को ब्लॉक किया जा सकेगा। चूंकि, ऊंट के एंटीबॉडीज के अणुओं का आकार दस गुणा छोटा है इसलिए इन्हें आसानी से संक्रमित जीवाणुओं की कोशिकाओं के काफी अंदर तक पहुंचाया जा सकता है। ये उन संक्रमित जीवाणुओं को लॉक कर देंगे जिनके कारण एंटीबायोटिक दवाएं निष्प्रभावी हो जाती हैं। इससे बीमारियों का प्रभावशाली इलाज हो सकेगा।

ऊंट के एंटीबॉडीज से होगा कैंसर जैसी बीमारियों का इलाज

सर्पदंश और अन्य बीमारियों के इलाज में कारगर

इस प्रयोग में साथ निभाने वाले उष्ट्र अनुसंधान परिषद (एनसीआरआइ) बीकानेर, के राकेश रंजन ने बताया कि ऊंट के एंटीबॉडीज अणु मनुष्य की कोशिकाओं (सेल्स) और ऊतकों (टिश्यूज) के काफी भीतर तक आसानी से जा सकते हैं। इसलिए इनका उपयोग बीमारियों की पहचान से लेकर उनके इलाज में काफी कारगर साबित होगा। सर्पदंश की दवाओं में ये बेहद कारगर साबित होने वाला है।

बीकानेर के ऊंट से निकाला एंटीबॉडीज

डॉ अरविंद ने कहा कि भारत में पहली बार ऊंट के भीतर से यह एंटीबॉडीज अणु निकालने में सफलता मिली है। इसके लिए उनकी टीम पिछले तीन साल से प्रयास कर रही थी। इस टीम में सुशांत कुमार, इथैयाराजा, अर्णव आत्रेय और राकेश रंजन थे। इससे पहले ब्रसेल्स में एक ऊंट से एंटबॉडी निकालने में सफलता मिली थी लेकिन बीकानेर के ऊंट से निकाले गए एंटीबॉडीज अणु में एक विशेष खासियत यह है कि उसमें जिंक आयन मिला है। यह बीमारियों के इलाज को और प्रभावकारी बनाएगा। चूहे का एंटीबॉडीज निकालना काफी कठिन होता है और इसके लिए चूहों को मारना होता है। ऊंट से एंटीबॉडीज निकालना सरल और किफायती है। यह ऊंट के रक्त से निकाला जा सकता है। आने वाले समय में यह काफी लोकिप्रय विज्ञान और प्रभावकारी जैव उपकरण साबित होगा।

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Rajeev Mishra
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